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दुविधा

अर्जुन प्रसाद गुप्ता

अर्जुन प्रसाद गुप्ता

बाटमे पैघ,
असीम चौरगर,
असीम गहीर,
दूर दूर धरि
जल मग्न,
मानी कोनो एक
महासागर फैलल,
जकर ओइ पार
हमर जीवनक
लक्ष्य रुपी वृष
खडा भऽकऽ
वसन्त पवनमे
झुमि रहल य,
मूदा
हमरा आ
हमर लक्ष्य रुपी
वृष बीच पसरल
महासागर
जकरा पार कयनाइ
हमर क्षमता नहि,
पार करबाक
कोनो साधन नहि,
जेना लागि रहल
हम अपन
खुला आंखि
स्वप्ननील गगनमे
विहरि रहल छी,
पार करब तऽ
सफल व्यक्तित्व,
पार नहि कऽसकब तऽ,
जिन्दा लाश,
यदि
अही पार रहि जाइछी तऽ
रैन पूनमक
पूर्ण पूर्णिमा
हमरा लागै
करीया अमावश,
लहराति वसन्त
सिहकै पवन
वाग रहिगेल पतझड,
किया कि
लक्ष्यविहिन जीवन
उद्धेश्यविहिन बाट
आखिर जीवन
रहिजाति निस्सार,
अहिलेल मनमे
अछि दुविधा ।
मनमे दुविधा