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मैथिली, विद्यापति आ वनौली

अजय कुमार झा

           अजय कुमार झा

मैथिली भारतक बिहार एवं झारखण्ड राज्य तथा नेपालक तराई भूभागके मुख्य भाषा छैक । मैथिलीकेँ हिन्दी प्रदेशक उपभाषा ‘बिहारी’ के बोली मानल जायत छैक । भाषिक आधारपर मैथिली हिन्दी, बांग्ला, असमिया, उडीया आ नेपालीसँ निकट छैक । बँगला, असमिया आ ओडियाकसँग एकर उत्पत्ति मागधी प्राकृतसे भेल बताओल जायत छैक । किछु अंशमे बंगला आ किछु अंशमे हिंदीसँ मैथिलिक समानता देखल जायत छैक । मुदा मैथिलीक प्रमुख स्रोत संस्कृत भाषा छैक, जकर शब्द तत्सम वा तद्भव रूपमे मैथिलीमे प्रयुक्त होयत छैक । ‘मैथिली’ नाम पौराणिक राज्यगणराज्य ‘मिथिला’सँ सम्बद्ध छैक । मैथिल भूभाग मिथिलाञ्चल नामसँ सेहो जानल जायत छैक । ‘मिथिला’ शब्द भारतीय–नेपाली साहित्यमे बहुत पहिनेसँ व्यवहृत छैक । मैथिली प्राचीन भाषा हिन्द–आर्य परिवारक सदस्य छैक । ई भाषा बोलय वा सुनयमे अत्यन्त मोहक लगैत छैक । मैथिलीक केन्द्र मिथिला या विदेह या तिरहुत छैक । मिथिलाक राजा जनकक राजधानी जनकपुर छलनि । वर्तमानमे जनकपुर संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालक प्रदेश २ के राजधानी छैक । एहि प्रदेशक मुख्य भाषा मैथिली, भोजपुरी, वज्जिका छैक ।
प्रदेश २ मे आठटा जिला पूर्वसँ पश्चिम क्रमशः सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा आ पर्सा पडैत छैक । विक्रम वर्ष २०६८ क जनगणना मुताबिक सप्तरीसँ महोत्तरीतक चारि जिलामे मैथिली बोलयवलाक प्रतिशत ८० सँ ९५ तक छैक । पश्चिममे पर्सा आ बाराक मुख्य भाषा भोजपुरी छैक पर्सामे ७९.१४ आ बारामे ७२.० प्रतिशत भोजपुरीक उपस्थिति छैक । सर्लाही आ रौतहटमे वज्जिकाक प्रधानता छैक । ४९.०२ प्रतिशत सर्लाहीवासी आ ६०.३ प्रतिशत रौतहटवासी वज्जिका बजैत छथि । सर्लाहीमे मैथिली २१.२, नेपाली ११.८, उर्दू ६.३३, तामाङ ४.७९ प्रतिशत बोलल जायत छैक । तहिना रौतहटमे उर्दू १९.३, नेपाली ६.१, भोजपुरी ४.३, थारु ३.३ आ मैथिली ३ प्रतिशत बोलल जायत छैक ।
एहि प्रदेशमे देशके सभसँ नम्हर भाषा नेपाली ५.५९ प्रतिशत मुदा दोसर नम्हर भाषा मैथिली ४८.५ प्रतिशत बोलल जायत छैक । मैथिली प्रदेश २ के सभसँ नम्हर भाषा छैक । तहिना दोसर आ तेसर नम्हर भाषा भोजपुरी आ वज्जिका छैक । जकर हैसियत क्रमशः १९.३४ आ १३.६६ प्रतिशत छैक । चारिम आ पाँचम भाषा उर्दू आ थारू जे क्रमशः ५.५ आ ३.३९ प्रतिशत बोलल जायत छैक । सप्तरी, सिरहा, धनुषा आ महोत्तरीमे मैथिली औसतन ८७.८२ प्रतिशत, सर्लाही आ रौतहट दू जिलामे वज्जिका औसतन ५४.६६ प्रतिशत आ बारा एवं पर्सा दू जिलामे भौजपुरी औसतन ७५.०७ प्रतिशत बोलल जायत छैक । एहि प्रकार नेपालमे सप्तरीसँ सर्लाहीतकके भूभाग मुख्य मैथिली भाषी क्षेत्र छैक ।
मिथिलाञ्चलक नेपालसँ पैघ हिस्सा भारतमे पडैत छैक । मैथिली भारतमे मुख्य रूपसँ दरभंगा, मधुबनी, सीतामढी, समस्तीपुर, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, शिवहर, भागलपुर, मधेपुरा, अररिया, सुपौल, वैशाली, सहरसा, रांची, बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद और देवघर जिलामे बोलल जायत छैक ।
मैथिली मिथिलाक्षर तथा कैथी लिपिमे लिखायत छलैक, जे बांग्ला और असमिया लिपिसँ मिलैत छैक । मुदा मैथिली आइ–काल्हि देवनागरीमे लिखाव लगलैक । मिथिलाक्षर तिरहुता आ वैदेही लिपिक नामसँ सेहो जानल जायत छैक । मिथिलाक्षरकेँ असमिया, बांगला एवं उडिया लिपिक जननीक उपाधि प्राप्त छैक । उडिया लिपि बादमे द्रविड भाषासभक सम्पर्कक कारण परिवर्तित भगेल छैक ।
मैथिलीक प्रथम प्रमाण रामायणमे मिलैत छैक । मैथिली त्रेता युगमें मिथिला राज्यक राज्यभाषा छल । एहि प्रकार इ इतिहासके प्राचीनतम भाषामेसँ एक मानल जायत छैक । प्राचीन मैथिलीके विकासक प्रारम्भ प्राकृत आ अपभ्रंश के विकाससँ जोडल जायत छैक । लगभग ७०० इस्वीके आसपास मैथिलीमे रचना होमय लागल छलैक ।


आदिकवि विद्यापति मैथिली भाषासाहित्यके शिखर पुरुष छथि । संस्कृत आ अवहट्टक समागमसँ मैथिलिक उत्पत्ति भेल छैक । ई दू प्रमुख भाषा छैक, जाहिसँ मैथिलीक विकास भेलैक । भारतके लगभग ५.६ प्रतिशत आबादीसहित संसारमे लगभग ७–८ करोड लोकक मातृ–भाषा मैथिली छैक । मैथिली विश्वके सर्वाधिक समृद्ध, शालीन और मिठासपूर्ण भाषासभमेसँ एक मानल जायत छैक ।
मैथिलीके अपन लिपि छैक, जे एक समृद्ध भाषाक पहिल पहचान होयत छैक । संस्कृति सबहक मूल होयत छैक, एहि मानेमे मैथिली सभसँ धनिक भाषा छैक । मैथिली, अवधि, भोजपुरी, मागधी संस्कृति मूलतः मध्यदेशीय संस्कृतिक हिस्सासभ छैक । मैथिली जतेक विकसित आ विस्तारित संस्कृति दुनियामे दोसर नहि छैक । दशमी, दिवाली, छठि, समाचकेवा, जाग, फाग, रस–राग, नाच, नचारी, उत्सव पर उत्सव, पावैन पर पावैन । एकादशी, चतुरदशी, रवि, सोम, वृहस्पैत, शुक्करवारी, शनि–मंगल, गर–गोसाइँ, अरदरा, घडि, लवान आदि अनन्त पूजा, दान, पुन, कथा, पुराण, स्तोत्र, पाठ, जाप, जोग, साध, समाधि, आत्मा–परमात्मा आदि अनादि एक विशाल संस्कृतिसँ अलंकृत मैथिलीक भाषा, साहित्य एहि समग्रताक सँग कोनो आन संकृतिसँ नहि भए सकैत अछि ।
मुदा एहि भाषाक पिछला इतिहास अत्यन्त कमजोर रहल देखल जायत छैक । समकलीन भाषा, कला, साहित्यक तुलनामे मैथिली आगाँ नहि बढि सकल । मैथिली भाषी क्षेत्र अखण्डित नहि रहि सकल । दोसरदिस नेपाली, अंग्रेजी, हिन्दी सेहो एकरा दबवैत गेलैक । मैथिलीमे अपन ब्याकरण आ अलंकारक प्रयोग संकुचित होयत गेलैक । नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू आदिके प्रयोग बढैत गेलैक । मुदा मैथिलीक पक्षमे सेहो किछु निक संकेतसभ देखल जायत अछि । मैथिलीक विकासमे सरकारी निकाय, गैरसरकारी संस्था, मीडिया, कला, प्रतिभाक क्षेत्रक प्रयास बढि रहल छैक । रेडियो, टिभी, समाचार, नाटक, अन्तरवार्तामे मैथिली अप्पन स्थान बनवैत आ बढवैत गेल छैक । टीवी च्यानल, इन्टरनेट सगठहि मैथिलीक मिट्ठा उपलब्ध छैक । एक्कैसम शताब्दी मैथिली साहित्यकेँ अनलाइन आयाम द रहल छैक ।
मैथिली भारत आ नेपाल दुनु देशमे राजभाषाक रूपमे सम्मानित छैक । वर्ष २००३ मे मैथिली भाषाकेँ भारतीय संविधानक आठम् अनुसूचीमे सम्मिलित कयल गेल । मैथिली हिन्दी क्षेत्रक बोलीसभमे आठम् अनुसूचीमे स्थान पावयवला एकमात्र बोली छैक । नेपाली संविधान मैथिलीकेँ राष्ट्रिय भाषाक मान्यता देने अछि ।
सरकारद्वारा मैथिली भाषाक विकास हेतु किछु कदम अवश्य उठायल गेल छैक । मुदा मैथिली रचना, पुस्तक, अनुवाद, भाष्य, आख्यान, चलचित्र आदिक दशा आ दुर्गति देखि चिन्ता उत्पन्न होयत छैक ।
मैथिलक संख्या सात–आठ करोड मानल जायत छैक, जे मैथिली साहित्यक लेल एकटा पैघ बजार भसकैछ । साहित्यमे मैथिली सम्पन्न छैक । मैथिली साहित्यक पुनर्लेखनक मात्रसँ मैथिलीक दुर्गति समाप्त भसकैछ ।
मैथिलीक सभसँ प्राचीन साहित्य बौद्ध तांत्रिकक अपभ्रंश दोहा आ भाषा गीतमे पाओल जायत छैक । एकर भाषा मिथिलाक पूर्वीभागक बोलीके प्राचीन रूप छैक तथापि बँगला, उडिया आ असमिया सेहो अपन आदि–साहित्य मैथिलिएके मानैत छैक । इतिहासमे मिथिला भूमिपर कर्णाट राजासभक उदय भेल छलनि । ओसभ मैथिल संगीतक परम्परा स्थापित केलनि । मैथिली विकासक इतिहासमे कर्णाटवंशी हरसिंह देवक कालकेँ स्वर्णयुग (लगभग १३२४ ई.) मानल जायत छैक । ओ सभ मैथिलीकेँ काठमाण्डू उपत्यकातक विस्तार केलनि । ज्योतिरीश्वर ठाकुर मैथिलीक आधार पुरुष छथि । हुन “वर्णन–रत्नाकर” नामक महान गद्यकाव्य प्राप्त छैक । एहि काव्यमे काव्यक उपयोगार्थ उपमा आ वर्णनसभ सजाक राखल गेल अछि । हुनक “धूर्तसमागम” नाटक आ गीत सेहो प्राप्त छैक ।
ज्योतिरीश्वर ठाकुरक उपरांत विद्यापति ठाकुरक युग अवैत छनि । (१३५०–१४५०) इतिहासक ओहि कालखण्डमे मिथिलामे ओइनिवार वंशक राज छलैक । बंगालमे जयदेव जेना कृष्ण–प्रेम संगीतक परम्परा चलौलनि, तहिना विद्यापति ओ हजारो पदमे अपन सुर मिलौलनि । एहिसँ मैथिली काव्यधारा (विशेषतः गीतिकाव्य) क परम्परा चलल, जे तीन शताब्दितक चमकैत रहल ।
विद्यापतिक प्रसिद्धि बंगाल, आसाम आ उडिसामे खूब छैक । उम्हर विद्यापतिकेँ वैष्णव मानल गेल छनि । हुनक अनुकरण करैत कवि पुस्तादर पुस्ता मैथिली पदावलिक रचना करैत आयल अछि । उएह साहित्यिक परम्परा आधुनिक कालतक चलैत आयल अछि । बीसम् शताब्दिमे विश्वकवि रविन्द्र “भानुसिंहेर पदावली” क नामसँ कएक सुन्दर ब्रजबुलीद पद लिखलनि ।

नेपाल, भारत, मैथिली, बंगाली, आसामी, उडिया भाषा–संस्कृतिक ऐतिहासिक पुरुष विद्यापतिक जीवनसँ जुडल कोनोहु तरहक विवादक निपटारा जते जल्दी होय तते निक । नेपाल आ भारतक सरकार, नेपाल प्रदेश २ के सरकार आ मैथिली, बंगाली, आसामी, उडिया भाषाभाषी साहित्यकारसभक जिम्मेवारी होयत छनि जे सभकिओ मिली विवादक समाधान शीघ्र होय ।

विद्यापतिक परम्परा मिथिलाक कण कणमे व्याप्त छैक । राधाकृष्ण शृंगारसँ वैष्णव आ शैव–शाक्त उपासनातक, गोसाउनिक गीतसँ नचारीतक मैथिलक संस्कार आ गलागलामे पहुँचल अछि । विद्यापतिक समकालीन कवि अमृतकर, चन्द्रकला, भानु, दशावधान, विष्णुपुरी, कवि शेखर यशोधर, चतुर्भुज आ भीषम कविक भूमिका विशिष्ट रहल छैक । विद्यापतिक परवर्ती कवि महाराज कंसनारायण (१५२७ ई.) क दरबारकविसभक नाम अवैत छैक । ओहि शृंखलामे सभसँ प्रसिद्ध कवि गोविन्द भेलाह । विद्यापति परम्पराक परकालीन कविमे महिनाथ ठाकुर, लोचन झा, हर्षनाथ झा आ चंदा झाक नाम अवैत छनि । काठमाण्डु उपत्यकामे विद्यापतिक शिव–शक्ति उपासना विशेष अनुकरणीय भेलैक । उपत्यकामे मैथिली कवि राजा सिद्धि नरसिंह मल्ल, जग्गज्योतिर्य मल्ल, लक्ष्मी नरसिंह मल्ल, भूपतिन्द्र मल्ल, रञ्जित मल्ल, जयप्रकाश मल्ल आ जीतामित्र मल्ल विशेष प्रसिद्ध भेलाह ।
मध्यकालमे मुसलमानी आक्रमणक कारण मिथिलाक ओइनिवार वंशक राज्य नष्ट भगेलासँ मिथिलाक अधिकांश कवि आ संगीतज्ञ नेपालक राजदरबारक संरक्षणमे चलि गेल । उपत्यकाक मल्लराजासभकेँ काव्य आ नाटकके निक रुची छलनि । ताहिकारणे मध्ययुगीन मैथिली साहित्यक एक पैघ अंश नेपालमे लिखल गेल ।
विद्यापतिक काव्य जीवनक पूर्वार्धमे गोविन्द कवि, रामदास, देवानन्द, उमापति, रमापति लोकप्रिय भेलाह त उत्तरार्धमे लाल कवि, नंदीपति, गाकुलानंद, जयानंद कान्हाराम, रत्नपाणि, भानुनाथ आ हर्षनाथ प्रसिद्ध भेलाह । तकरबाद विश्वनाथ झा, “बालाजी”, चंदा झा आ राजपंडित बलदेव मिश्र छथि । विद्यापति परम्पराक अतिरिक्तो गीतिकाव्यकारक संख्या निक छनि । भज्जन कवि, लाल कवि, कर्ण श्याम प्रभृंति, कृष्णजन्म कर्ता मनवोध, नंदापति रतिपति, चक्रपाणि आदि । एकटा तेसर धार संतसभक भेलनि— जाहिमे साहब रामदास खुब प्रसिद्ध भेलाह । (रचनाकाल १७८६ ईं) । नवयुगके निर्माणमे कवीश्वर चंदा झाक नाम उल्लेखनीय छैनि । हुनक महाकाव्य “रामायण”क रचनास“ मैथिली भाषाक गौरव आर अधिक ऊँच भेल अछि । तदोपरान्त महाकवि लाल दास (सन् १८५६–१९२१) प्रसिद्ध साहित्यकार भेलाह ।
मैथिली भाषाक उल्लेख होयतहि एकर इतिहास लगभग विद्यापतिसँ आरम्भ भेल दृष्टिगोचर होयत अछि । लगभग छ शताब्दी उपरान्तो मैथिल कवीकोकिल महाकवि विद्यापतिक समतुल्य स्थान दोसर कियो नहि लय सकल छथि ।
विद्यापति मैथिलीक सर्वोपरि कवि छथि । हुनक काव्यमे मध्यकालीन मैथिली भाषाक स्वरूपक दर्शन कयल जासकैत छैक । हुनका वैष्णव, शैव आ शाक्तभक्तिके सेतुके रूपमे स्वीकार कयल गेल छनि । “देसिल बयना सब जन मिट्ठा” कहिक ओ मिथिला जागरणक शंखघोष केलनि । मिथिलांचलक लोकगीत विद्यापतिक विविधरससँ भरल छैक । पदावली, कीर्तिलता, कीर्तिपताका, लिखनावली आदि अनेक हुनक अमर रचना युगयुगान्तर काव्यधाराकेँ दिशा आ गति प्रदान करैत रहत । कीर्तिपताकामे विद्यापति राजा शिवसिंहके यशोवर्णन केने छथि । एहि ग्रन्थक रचना दोहा आ छन्दमे कयल गेल छैक । कतो–कतो संस्कृत श्लोकक प्रयोग सेहो भेल छैक । लिखनावली पत्रलेखनसम्बन्धी एक प्रकारक नियमावली छैक । विद्यापति देखलनि जे जनमानसमे पत्रलेखनसम्बन्धी नियमावलीक कोनो मानदण्ड नहि छैक । त ओ ओही अभावक पूर्ति हेतु ‘लिखनावली’क रचना केलनि । लिखनावलीक माध्यमसँ ओ ओइनवारकालीन मिथिलाक शासन व्यवस्थाके व्यवस्थित स्वरूप प्रदान कयने छथि । लिखनावली तत्कालीन मिथिलाक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवनक जीवन्त चित्र प्रस्तुत करैत छैक ।
दक्षिणी मिथिला राजा शिव सिंह छलथि, ओहि समय उत्तरी मिथिलाक सप्तरीमे द्रोणवार वंशक शासन छल, राजा गिरि नारायण पुरादित्य छलाह । हुनक राजधानी मध्य सप्तरीमे अवस्थित वनौली छलनि । राजा शिव सिंह युद्धसँ अदृश्य भगेलाक उपरान्त विद्यापति रानी लखिमादेवीके वनौली पहुँचा देलनि । वनौलीमे ओ १२ वर्ष रहलाह । ओहिठाम विद्यापति राजा पुरादित्यक आग्रहपर लिखनावलीक रचना केलनि । शोकाकुल रानी लखिमादेवीकेँ सान्त्वना देवालेल ओ मैथिलीमे ‘श्रीमद्भागवत’ लिखलनि । लिखनावलीमे ओ उल्लेख केने छथि— “ल.सं. ३०९ श्रावण सुदि १५ कुजे राजवनौली ग्रामे विद्यापते लिपिरयम” । सप्तरीमे विद्यापति अत्यन्त प्रसिद्ध छथि । वनौलीमे विद्यापति नामक नाटक अखनो प्रचलित छैक ।
अखन वनौलीक बातपर बडका विवाद उठा देल गेल छैक । एकटा वनौली महोत्तरीमे छैक । तैँ किछु महाशय महोत्तरीक वनौलीकेँ विद्यापतिक वनौली मानैत छथि । सिरहामे लहानलग सेहो वनौली गढी छैक आ सप्तरीएमे एकटा दोसर वनौली खाँडो नदीसँ पूर्व सेहो छैक ।
मैथिली नेपाल राज्यक दोसर सभसँ नम्हर भाषा छैक आ प्रदेश २ के सभसँ नम्हर भाषा छैक । महाकवि विद्यापति तुलसी, सूर, कबूर, मीरा सभसँ पहिनेके कवि छथि । विद्यापतिकेँ संस्कृत, अवहट, मैथिली, बंगाली, आसामी, उडिया भाषा संस्कृतिक विम्ब आ प्रतीक मानल जायत छनि । विद्यापतिक जन्म विस्फीमे भेलनि । हुनक कर्मभूमि भारत आ नेपाल दूनु ठाम रहलनि । हुनक जीवनक उत्तरार्ध राजा पुरादित्यक राजधानी वनौलीमे बितलनि । एहि सब बातमे कोनो संशय नहि । मुदा विद्यापतिक वनौली कोन छैक ताहि बात पर किछु कालसँ तथाकथित ढंगसँ विवाद उपस्थित कयल गेल छैक । विद्यापतिक वनौली सप्तरीक वनौली थिकैैक कि सिरहा वा महोत्तरीके । इतिहासविद् प्रा. हरिकान्त लाल दास, मैथिलीक प्रकाण्ड विद्वान डा. जयकान्त मिश्र, रमानाथ झा सप्तरी वनौलीकेँ विद्यापतिक वनौली मानैत छथि । नेपाल, भारत आ मैथिली, बंगाली, आसामी, उडिया भाषा–संस्कृतिक महान ऐतिहासिक पुरुष विद्यापतिक जीवनसँ कोनो तरहक विवाद हजम होमयवला बात नहि भसैछ । एहेन विवादक निपटारा जते जल्दी होय तते निक । नेपाल आ भारतक सरकार, नेपाल प्रदेश २ के सरकार आ मैथिली, बंगाली, आसामी, उडिया भाषाभाषी साहित्यकारसभक जिम्मेवारी होयत छनि जे सभकिओ मिली विवादक समाधान शीघ्र होय । इतिहासविद् दासक कथन छनि जे पुरातत्व विभाग सप्तरी वनौलीके उत्खनन करा एहि बातक निराकरण कसकैत अछि ।
सप्तरी वनौलीमे विद्यापतिक विभिन्न बात प्रचलित छैक । ओहिठाम एक गोट विन्देश्वर राम छलाह । पेसासँ ओ शिक्षक भेलाह । महाकवि विद्यापतिक वनौलीपर नेपाली भाषामे स्व. विन्देश्वर रामक एकटा रचना छनि । हुनक पुत्रसभ सुरेन्द्र राम आ नवेन्द्र रामसँ हमरा एकटा छाया प्रति प्राप्तो भेल अछि । हुनक रचनाक किछु अंश पत्रपत्रिकामे प्रकाशित छैक । मुदा मूल रचना अप्रकाशित छैक । सप्तरी वनौलीकेँ विद्यापतिक वनौलीक रूपमे सप्रमाण समर्थन करैत ओ अपन रचनामे सप्तरी वनौलीकेँ विद्यापतिक वनौली नहि मानयवला तर्ककेँ खण्डन केने छथि । समयसमयपर ओहिठाम माटिसँ प्रकट भेल पुरातात्विक वस्तुकेँ आधार प्रमाण मानैत ओ ओहिठामक उत्खननपर जोड दैत छथि ।
मैथिली साहित्य परिषद्मे नवनिर्वाचित हमसभ अध्यक्ष सतीश कुमार दत्तक नेतृत्वमे वनौली ग्रामके स्थलगत भ्रमण कयलहुँ । स्थानीय समाजक सेहो कथन पाओल गेल जे विद्यापतिक वनौलीपर बनल विवादक अन्त्य भगेलापर वनौलीमे विकासक प्रक्रिया प्रारम्भ भजायत ।
–सम्प्रति लेखक मैथिली साहित्य परिषद् राजविराज, सप्तरीमे‌ं सचिव छथि ।