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पश्चिमी संस्कृतिके बढैत प्रभावः मिथिलाञ्चल में वैलेन्टाईन डे

पश्चिमी संस्कृतिके बढैत प्रभावः मिथिलाञ्चल में वैलेन्टाईन डे
– करुणा झा

– करुणा झा । पश्चिमी संस्कृति जाहि तरहसँ अपन संस्कृतिपर हावी भऽ रहल अछि, एहिसँ कियो अछुता नहि रहि गेल । अपन सब के संस्कृति सनातन आ शाश्वत अछि, मुदा आइ मिथिलाञ्चलसँ बहुतोरास पावनि तिहार सब विलुप्त अवस्था में अछि । जेना– झिझिया, जट–जटिन, सामा चकेवा । पश्चिमी संस्कृतिके प्रभाव आजुक यूवा वर्गपर कापीm परल अछि, मदर्स डे, फादर्स डे, चिल्ड्रेनस डे के सङ्गे वैलेन्टाईन डे सेहो आब नवरात्रीके नवो दिन जँका मनाओल जा’ रहल अछि ।
रोज डे, प्रपोज डे स लऽ कऽ वैलेन्टाईन डे आब नवरात्री जका यूवा वर्ग सव मना रहल अछि । आजुक एहि वैश्वीकरण के यूगमे १४ फरवरी लगभग पुरे विश्वमें अपन पदार्पण कऽ लेने अछि, मातृ देवो भवः पितृ देवो भवः आचार्य देवो भवः के हमर सबहक संस्कृति के आजूक यूवा वर्ग वैलेन्टाइन डे में परिणत कऽ रहल अछि । यूरोप आ अमेरिका समाजमें कोनो पुरुष आ महिला एहन नहि जेकर सम्बन्ध एकटा विवाह तक सीमित रहल अछि । ओई ठाम लिभ इन रिलेसनसिपमें रहबाक परम्परा आई अपना सभके समाजमें सेहो आबि गेल अछि ।
आइसँ लगभगत १५०० साल पहिने यूरोपमे एकटा दार्शनिक भेल छलाह वैलेन्टाईन (४७८ ए.डि.) में । जबकि हमर संस्कृति १५००० सालसँ भी बेसी प्राचीन आ सनातन अछि । ओ वैलेन्टाईन भारत भ्रमण के क्रम में भारतीय दर्शन शास्त्र सबके बहुत गहराईसँ अध्ययन केलनि, ओ पुरे रोम में घुमि घुमि कऽ भारतीय संस्कृति के प्रचार करय लागलाह । एक पुरुष एक महला के सम्बन्ध आ’ भारतीय सभ्यता के महत्व सँ सबके प्रभावित करय लागल, ओई समय में रोम के राजा क्लौडियस बहुत प्रतापी राजा छल, वैलेन्टाइन हमरा रोम के संस्कृति के बिगाडि रहल अछि । हमसब बिना विवाह शादीके मौज मस्तीमें रहै छी आ’ ई सबके विवाह कराओने फिरै य’ । ई हमर संस्कृति के नष्ट कऽ रहल अछि । ओ वैलेन्टाइन के मृत्यु दण्ड के सजा सुनौलनि । १४ फरबरी ४९८ ई.पू.में वैलेन्टाइनके फाँसी दऽ देल गेल । वैलेन्टाइन के समर्थक सब ओहि दिनसँ १४ फरबरी के वैलेन्टाइन डे (प्रणय दिवस)के रुपमे मनेबाक चलन शुरु भेल ।
अजीब विडम्बना अछि जे अपन संस्कृति के नष्ट करबाके लेल जिनका फाँसी देल गेल ओ हमर सबहक संस्कृतिके महान कहि कऽ अनुसरण करैत छल । आइ हमसब ठीक विपरीत कऽ रहल छी, हमर सब के भावी पुस्ता आब यूरोप के संस्कृति के मोर्डन बुझि कऽ अपना के एडवांस काबै में गौरवानवीत हेता, मुदा अपन सबके मिथिलाके जे संस्कृति अछि, ई संस्कृति के बारे में बुझवा कऽ समय आब नई तऽ यूवा वर्गक संग अछि आ नई बुझेबा कऽ समय बुजुर्ग पर आई सब कियो पश्चिमी रंगमें रंगि गेल छी । ‘बसुधैव कुटुम्बकम’ के ज्ञानसँ दुनियाँ के आलोकित करैवाला अपन संस्कृति आई वैलेन्टाइन डे तक सीमित भऽ रहल अछि ।
प्रणय आ प्रेम दिवसके रुपमें मनाओल जाइत अछि, जे हमरा मिथिला के संस्कृतिमें लोग जन्म सँ लऽ कऽ मृत्यु धरि लोग प्रेमसँ जुडल रहैत अछि । माता–पिता, पति–पत्नी, सन्तान, दोस्त, समाज सबसँ प्रेम हमर संस्कृति अछि, जन्म सँ मरण धरि सोलह संस्कार, हरेक संस्कार के अपन महत्व, हरेक उत्सव के गीतनाद, सङ्गे पशु–पंक्षी आ प्रकृति प्रेमसँ हमर सबके जीवन जुडल अछि । जा धरि जीवन अछि ता धरि प्रेम अछि । बिना कोनो वैलेन्टाइन डे के–मीरा आ कृष्ण के प्रेम, दुनियाँ में प्रेम के अद्भूत उदाहरण अछि ।
प्रेम शाश्वत अछि, निरन्तर अछि प्रेम कोनो दिवसके मोहताज नई, ई सदति सदैब बहैवाला हृदय के निर्मल गंगा अछि । प्रेमके नहि कोनो विधि अछि आ’ नहि विधान । प्रेम हमेशा आनन्द दैत अछि । प्रेम में यदि पीडा अछि त ओकरो एक अलग आनन्द अछि, प्रेम कोनो व्यक्ति या कोनो दिवस तक सिमित नई भऽ सकैत अछि, ई अनन्त आकाशमें उन्मुक्त रहैत अछि । जेकर सबसँ पैघ उदाहरण अछि– कृष्ण आ मीरा के प्रेम, जे अपन संस्कृतिके महानतम प्रेमके उदाहरण अछि, शबरी आ रामके प्रेम– सुरदास आ कबीर के प्रेम–जखन हमसब अई प्रेम के नई बुझि सकलौं तऽ बैलेन्टाइन के प्रेम की बुझब ।
अपन संस्कृति अपन धरोहर अछि – अपन संस्कृति के जोगाउ, वैलेन्टाईन डे मनाबैके विरोधी नई मुदा प्रेम दिवस मनाबैके लेल पूरा जीवन कम अछि ।