ब्रजमोहन झा, जनकपुर
रसभरीके बोरमे रसगर कत’ भेटत
गेल अदरा आम आब कसगर कत’ भेटत
जिबैय हमरा देहमे, दश बिस आदमी
तैयो ताकै छी “मोहन” असगर कत’ भेटत ।
बिहुसैय फुलल गाल, देखि कनियाके ऐना कि
लोटय करेजा साँप, देखि चोटीमे गेना कि
गेलै बिदेश भाई, हेतै गाम हरियाली
तैयो कनैय खेतमे रोटी ला नेना कि ।
रंक छी तय शाह सन गरदन बनौलौ हम
अपने कपारके टिक ध’ नोकर बनौलौ हम
कहैय हमरा लोक सभ छै भाग्य खोरनाठल
निसब्द रातिमे दिपके बिहुस’ सिखौलौ हम ।
बाढैन बर्तन खाना, हम्मर काम कि रहत,
नैहर सासुर एक्के, फेर आराम कि रहत
जनमैलहु बच्चा हम, जगजाहैर छै सगरो,
टिपनिमे ओकरा, हम्मर नाम कि रहत ।