सोगारथ यादव
हे युवा उठु,
आहाँ कौलका भोर छि ।
प्रचंड गर्मिके सहासी,
आहाँ पथके डोर छि ।।
सब गुण सऽ भरल ,
आहाँ सतरंगी छि ।
बदलैत रिति प्रथा,
आहाँ न्या सुरुवात छि ।।
हे युवा उठु,
आहाँ वसंतके हवा सितल छि ।
किचर सँऽ भरल समाजमे,
आहाँ फुलल कमल छि ।।
चिन्हुँ अपन नम्रता,
आर कठोर जैरके ।
कतेक मजबुत अछी,
आहाँ देखु बाँझल पैरके ।।
हे युवा उठु,
आहा न्याँ प्रबेश छि ।
चिंन्हुँ देर नै करु,
आहाँ न्याँ संदेश छि ।।
बिन गर्जल बर्सात,
आहाँ होन्हारी नंक्षत्र छि ।
भबिस्य केर कर्णधार,
आहाँ मुख्य पात्र छि ।।
हे युवा उठु,
आहाँ कौलका भोर छि ।
प्रचंड गर्मिकेर सहाशी,
आहाँ पथकेर डोर छि ।।