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जय मिथिला, जय मधेश आ जय देश

जय मिथिला, जय मधेश आ जय देश

अजय कुमार झा

          अजय कुमार झा

सर्वप्रथम ईस्वी संवत् २०२० के सुखद आगमनपर भाषा अधिकारलेल संसारभरि क्रियाशील समस्त पक्षकप्रति उत्तरोत्तर सफलताक शुभकामना प्रकट करैत छी । संसारभरि प्रायः कोनो ने कोनो अधिकारकलेल मानव जाति संघर्षरत छैक । नेपाल आ नेपाली नागरिक सेहो २१म् शताब्दिक गर्भेकालसँ विविध अधिकारलेल संघर्षरत रहि आयल अछि । ओहि संघर्षसभमें भाषा अधिकारक संघर्ष सेहो ततवहि पुरान छैक । नेपालमे भाषा संघर्ष हिमाल, पहाड, मधेश सगठहि छैक । मुदा भाषा अधिकारक संघर्षमे मधेशक भूमिका अग्रणी छैक । मधेशी समुदाय अर्थात् मैथिल, भोजपुरी, अवधी, वज्जी आदि मातृभाषी समुदाय राष्ट्रभाषाक रूपमे नेपाली भाषाक अनुकरण करैत अपन अपन मातृभाषा आ क्षेत्रीय सम्पर्क भाषाक समुचित सम्मान आ स्थान लेल सतत संघर्ष करैत आयल अछि ।

भाषाक अर्थ मनुष्यक अभिव्यक्तिसँ जुडल हेवाक कारण भाषाकेँ परिभाषित करक प्रयास प्राचीने कालसँ होयत रहल अछि । प्राचीन कालमे सांस्कृतिक समूहसभक अपन अपन एकल राष्ट्र छल आ एकल राष्ट्रीय भाषा छल । सांस्कृतिक समूहसभ नगरराज्य वा जनपदमे परिवर्तित भेल । एहि परिवर्तित अवस्थामे नगरराज्य वा जनपद यद्यपि आपसी एकीकरण वा सम्मीलनसँ निर्मित भेल छल तैं समागममे भाषिक समस्या नहि भेल अपितु भाषिक सहिष्णुताक स्थापना कयल गेल । अपन भावना आ विचारक अभिव्यक्ति सभसँ सहज अपन मातृएभाषामे क’सकैत छी तैं ओहि समयमे हरेक मातृभाषाकेँ संरक्षित रहबामे आ करबालेल सभकेँ समान अवसर प्राप्त छलनि ।

नगरराज्य आ जनपद कालके बाद औपनिवेशिकराज्य, राष्ट्रियराज्य वा साम्राज्यक निर्माण प्रारम्भ भेल आ एहि क्रममे एक भाषा आ संस्कृतिक अतिक्रमण आन भाषा आ संस्कृतिपर प्रारम्भ भेल ।

भाषिक–सांस्कृतिक अतिक्रमणक अर्थ एक भाषा–संस्कृतिद्वारा दोसर भाषा–संस्कृतिपर हुकुम चलेनाई, आन भाषा–संस्कृतिक हक–अधिकार जफत क’लेनाय थिकै । वैचारिक आ सांघातिक तरिकासँ शोषण, उत्पीडन, आ अनेक तरहसँ शोषण आ विभेद करनाइ थिकै । भाषिक–सांस्कृतिक अतिक्रमणक तत्कालिक प्रभाव संरक्षणक अभाव आ दूरगामी प्रभाव लोपोन्मुख स्थितिमे भासैत जेनाइ थिकै । उपनिवेशक निर्माण बाह्य शक्तिद्वारा मात्र नहि, अपितु आन्तरिक शक्तिद्वारा सेहो होयत छैक । नेपाल सेहो तेहेन राज्य छैक, जाहिठाम भाषिक—सांस्कृतिक अतिक्रमणक सवालपर बहस पर बहस होयत आयल छैक । बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक राज्यकेँ भाषा आ संस्कृतिक चरित्रमे एकभग्गु नहि हेवाक चाही । मुदा नेपाल एकटा भाषाकेँ सर्वोपरी मानि आन भाषासभकेँ कुण्ठित करैत आयल अछि । राज्यक एकल भाषा नीतिपर अनेक घमर्थन होयत रहल अछि । मुदा तओ नवसंविधानमे राष्ट्रभाषा आ राष्ट्रीयभाषा करि विभेदक स्थिति विद्यमाने अछि ।

नवसंविधान सामन्ती, निरंकुश, केन्द्रीकृत आ एकात्मक राज्यव्यवस्थाद्वारा सिर्जित हरेक तरहक विभेद आ उत्पीडनके अन्त्य हेवाक घोषणा करैत अछि । ई संविधान नेपालकेँ बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक चरित्र आ भौगोलिक विविधताकेँ स्वीकार करैत अछि । संविधान सामाजिक न्याय, सहिष्णुता आ सद्भावके पक्षपोषण करैत अछि ।

संविधान दूटा अलग अलग धारामे राष्ट्र आ राज्यकेँ परिभाषित करैत अछि । बहुभौगोलिक, बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक नेपाली जनताकेँ ‘राष्ट्र’ शब्दसँ सम्बोधित करैत अछि । तहिना नेपाल राज्य कहिक’ स्वतन्त्र, अविभाज्य, सार्वभौमसत्तासम्पन्न, धर्मनिरपेक्ष, समावेशी, लोकतन्त्रात्मक, समाजवाद उन्मुख, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक राज्यके सम्बोधित करैत अछि ।

संविधान प्रत्येक नागरिकके मौलिक हकके रूपमे भाषा तथा संस्कृतिक हक प्रदान करैत अछि । प्रत्येक व्यक्ति आ समुदायकेँ अपन भाषा प्रयोग करबाक, अपन सांस्कृतिक जीवनमे सहभागी हेवाक, अपन भाषा, लिपि, संस्कृति, सांस्कृतिक सभ्यता आ सम्पदाक संवर्धन आ संरक्षण क’ सकत ।

संविधान राष्ट्रभाषा आ सरकारी कामकाजक भाषाक क’ दू तरहके भाषाक व्यवस्था केलक अछि । नेपालमे बोलइवला मातृभाषासभ राष्ट्रभाषा थिक । अर्थात नेपाली, मैथिलीलगायत सम्पूर्ण भाषासभ, जे नेपाल राज्यमे बोलल जायत छैक, अर्थात् नेपालिओ, से राष्ट्रभाषा थिकै । संविधानक एहि व्यवस्था अनुरूप नेपाली, मैथिली, हिन्दी सभटा भाषा एके श्रेणीमे स्थित देखल जायत छैक । मुदा संविधानक एक दोसर व्यवस्था, जाहिमे कहल गेल छैक जे नेपाली भाषा नेपालक सरकारी कामकाजक भाषा होयत, से व्यवस्था नेपाली भाषाकेँ आन भाषासभसँ विशिष्ट बनादैत छैक । संविधान नेपाली भाषाकेँ देशभरिमे सरकारी कामकाजक माध्यम मानैत अछि ।

संघीय संविधानके मुताबिक प्रदेश सरकार अपन प्रदेशमे एक वा अनेक भाषाकेँ प्रदेशक सरकारी कामकाजक भाषा बना सकैत अछि । मुदा इ काज करबालेल प्रदेश सरकारके स्वायत्तता प्राप्त नहि छैक । कारण जे संविधानमे आगाँ कहल गेल छैक, जे “भाषा सम्बन्धी अन्य कुरा भाषा आयोगको सिफारिसमा नेपाल सरकारले निर्णय गरे बमोजिम हुनेछ ।”

मैथिलीक आगाँ अखन तीनटा मुख्य चुनौती दृष्टिगोचर भ’रहल अछि । एक मैथिलीक प्रकाशन आ प्रसारणक अभिवृद्धि, दोसर नवपुस्तद्वारा मैथिली आन्दोलनके स्वामित्व ग्रहण आ तेसर मैथिलीकेँ मधेशसँ जुडल प्रदेशसभमे सरकारी कामकाजक भाषा बनौनाई ।

संविधानक धारा २८७ मे भाषा आयोग गठनक प्रावधान छैक । सरकारी कामकाजक भाषाक आधार तय करनाई भाषा आयोगके काम छैक । संविधान प्रारम्भ भेला एक वर्षभितर भाषा आयोग गठन करबाक छलैक आ  आयोगकेँ अपन कार्य कर’लेल पाँच वर्षक समय द’देल गेल छैक । प्रदेश सरकार भाषाक सम्बन्धमे कोनो काज नहि क’सकैत अछि । प्रदेश सरकार भाषासम्बन्धी संयन्त्रो नहि बना सकैत अछि, नेपाल सरकारद्वारा खडा कयल गेल भाषा आयोगक शाखाए प्रदेशमे कोनो कार्य क’सकत ।

एहि वर्ष सन् २०१९ क अन्त्यसँगहि १७ म् अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सम्पन्न कयल गेल । मैथिली भाषाक कर्मठ कार्यकर्ता प्रवीण नारायण चौधरीक संयोजनमे सम्मेलन विराटनगरमे आयोजन भेल । सम्मेलनमे नेपाल आ भारतसँ आयल तीन सौसँ अधिक मैथिलीभाषीक सहभागिता छल । एहिबेर महिलाक सहभागितामे वृद्धि देखल गेल । कार्यक्रममे मैथिली भाषाक अनेक कवि, लेखक, कार्यकर्तासभ ‘मिथिला रत्न’ सँ सुशोभित भेला । शोभायात्रा, सांस्कृतिक नाचगान सम्मेलनक अलंकार बनल । समाजवादी पार्टीक अध्यक्ष उपेन्द्र यादव प्रमुखअतिथिक रूपमे सम्मेलनक उद्घाटन केलनि । ‘जय मिथिला जय मधेश’क नारा दैत ओ अपन वक्तव्य पूरा केलनि । विगत सन् २०१७ आ २०१८ मे सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनद्वारा जारी घोषणापत्रकेँ अहु सम्मेलनसँ पारित कयल गेल ।

सम्मेलनमे मैथिली भाषासँ सम्बन्धित अनेक सबाल उठाओल गेल । नवसंविधानक घोषणाभेल चारि वर्ष बित चुकल अछि । मातृभाषा आ राष्ट्रीयभाषासँ सम्बन्धित धाराकेँ छोडि संविधानक सम्पूर्ण धाराक क्रियान्वयन भ’ चुकल अछि । एहेन अवस्थामे मातृभाषा आ राष्ट्रीयभाषाक अधिकार संविधानक देखावयवला दाँत सावित भ’रहल बुझल गेल । राष्ट्रीयभाषाक क्रियान्वयनमे अडचन खडा कर’लेल भाषा आयोगक गठन कयल गेल अछि । भाषा आयोगक अपूर्णता ओही अडचनक अंश थिक । भाषा अधिकारक प्रयोग करेबामे प्रदेश सरकारक सेहो अनेक जिमेवारी आ भूमिका छैक । प्रदेशमें मातृभाषामे शिक्षा, मातृभाषामे सरकारी नोकरी, राष्ट्रीयभाषासभक साहित्य, कला आदिक विकास कार्यमे निष्क्रियताकलेल प्रदेश सरकारक आलोचना कयल गेल । प्रदेशक सरकारी कामकाजक भाषाक निर्णय करबामे सरकारे नहि विधायिकाके सेहो विफल मानल गेल । ‘एक देश एक भाषा’क पुरान नीतिमे कोनो तरहक परिवर्तनक संकेत नहि बुझाइछ । दोसर दिस राष्ट्रीयभाषासभकेँ एकदोसरसँ बलझाक’ भाषा अधिकारलेल संघर्षरत शक्तिसभकेँ कमजोर करबाक गैरनेपाली राष्ट्रभाषाविरुद्ध नियोजित एवं कुत्सीत कार्य भ’रहल लगायत अनेक सवाल एहि सम्मेलनमे उठाओल गेल ।

भाषाक विकासमे योगदान करबाक मनसँ कयल गेल कार्य निरर्थक नहि जायछ । मुदा सम्मेलनक लेल सम्मेलन करी वा सम्मेलनपर सम्मेलन करैत रही आ हात किछु नहिं लागय त सम्मेलनक औचित्यपर सवाल नहि उठौ से नहि भ’सकैय । सम्मेलनक आधिकारिता आ स्वामित्व पर सेहो सवाल उठि सकैछ । सम्मेलनक घोषणाक प्रभाव अहि बातपर निर्भर करैत अछि, जे ओहि सम्मेलनक जनसहभागिताक स्थिति कतेक छैक । मिथिला वा मैथिलीक सम्मेलन कोनो एक मात्र मैथिलक नहि अपितु समस्त मिथिलाक सरोकारक विषय थिक । सम्मेलनक ठोस पूर्वाधार ताधरि नहि बनत जाधरि सम्मेलनक तैयारीमे अधिकसँ अधिक मैथिलजन परिचालित नहि हेता । तहुमे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनक बात त किछु आर छैक ।

भाषाक आधार इएह छैक जे अहाँ सर्वाधिक सहज कोन भाषामे महसुस करैत छी । कतेक लोक एकटा छोडि दोसर भाषा नहि जनैत अछि । कतेक लोक दूटा, तीनटा, चारिटा भाषा जनैत अछि । जे किओ जाहि भाषामे अपन बचपन बितौने रहल, ओहि भाषामे ओ अधिक कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त भ’सकैत अछि । भाषा व्यक्तिगत नहि भ’सकत । भाषा सदिखन समूहक विषय थिक । तैं भाषा अधिकारक विषय बनल । तैं भाषाक पाछु समूहगत क्रियाकलाप होयत छैक ।

नेपालमे १२३ गोट संख्यामें भाषाक व्यवहार मानल जायत छैक । नेपाली भाषा सभसँ उँच स्थानपर (४४.६३) छैक । नेपालीके बाद मैथिली दोसर स्थान (११.६७) पर, भोजपुरी तेसर स्थान (५.९८) पर, थारु तेसर स्थान (५.७७) छैक । वज्जिका सातम स्थान (२.९९) पर, उर्दू दसम् स्थान (२.६१) पर, अवधी एघारम् स्थान (१.८९) पर छैक । एकसँ एगारह तक रिक्त स्थानकेँ क्रमशः तामाङ्ग (५.१०), नेवारी (३.१९), मगर (२.९७), डोटेली (२.९७) भाषा पूर्ति करैत छैक, जे पहाडक भाषा छैक । अर्थात् देशके प्रमुख ११ टा भाषामेसँ ६ टा मधेशके आ पाँचटा पहाडके भाषा परैछैक । मधेशके आन भाषासभ जे एक प्रतिशतसँ कम छैक, ताहिमे राजवंशी, हिन्दी, मगही, उराउ, राजस्थानी, बंगाली, ताजपुरिया, अंगिका, गनगाई, पंजाबी, सिन्धी भाषा छैक । एक सौ तईसटा भाषा बजनिहार नेपाली जनताक संख्या २,६४,९४,५०४ छैक ।

मैथिलीक प्रथम प्रमाण रामायणमे मिलैत छैक । ई त्रेता युगमे मिथिलानरेश राजा जनकके राज्यभाषा छल । एहि प्रकार ई इतिहासके प्राचीनतम भाषासभमेसँ एक मानल जायत छैक । प्राचीन मैथिलीके विकासक शुरूआती दौर प्राकृत आ अपभ्रंशके विकाससँ जोडल जायत छैक । लगभग सात सौ इस्वीक आसपास एहि भाषामे रचना होमय लागत । विद्यापति मैथिलीके महाकवि तथा सर्वाधिक ज्ञाता कवि छथि । विद्यापति मैथिलीक अतिरिक्त संस्कृत तथा अवहट्टक सेहो रचना केलनि । ई ओ दू  प्रमुख भाषा थिक, जहिठामसँ मैथिलीक विकास भेल । मैथिली विश्वके सर्वाधिक समृद्ध, शालीन आ मिठास पूर्ण भाषासभमेसँ एक मानल जायत छैक । मैथिलीक अपन लिपि छैक, जे एक समृद्ध भाषाक प्रथम पहिचान छैक । मैथिली संघ–संस्थाक उदय भ’रहल छैक । मैथिली क्रियाकलाप बढि रहल छैक । मैथिली रचनाक प्रकाशन जे किछु वर्ष तक अवरुद्ध छलैक से आब गति ल’रहल छैक । मैथिली पत्रपत्रिकाक प्रकाशन बढि रहल छैक । अखन १५–२० टा रेडियो स्टेशन ऐहेन छैक, जाहिमे मैथिली भाषामे कार्यक्रम प्रसारित कयल जायत छैक । टिभीसभपर सेहो मैथिली खबर प्रसारित होयत छैक । एहि प्रकारे देखल जाय त मैथिली अपन चतुर्दिक विकास दिस गतिशील अवश्य छैक । यद्यपि कि एकर गति बड सुस्त छैक । सरकार आ जनस्तरसँ किछु अतिरिक्त प्रयास होय त एहेन सुस्ती हटाओल जा’सकैत अछि ।

मैथिलीक आगाँ अखन तीनटा मुख्य चुनौती दृष्टिगोचर भ’रहल अछि । एक मैथिलीक प्रकाशन आ प्रसारणक अभिवृद्धि, दोसर नवपुस्तद्वारा मैथिली आन्दोलनके स्वामित्व ग्रहण आ तेसर मैथिलीकेँ मधेशसँ जुडल प्रदेशसभमे सरकारी कामकाजक भाषा बनौनाई । नेपाली मिथिला समाज एहि चुनौतीसभकेँ उपलब्धिमूलक रूपमें पारँ क’ केना आगाँ बढय, ताहिलेल कार्यनीति आ रणनीतिक निर्माण अपरिहार्य छैक । अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलनसभक कार्यभार छोडि दिअ से नहि मुदा राष्ट्रीय सम्मेलनके सार्थक बनोनाई प्राथमिक बात भ’सकैछ । एहिलेल ‘जय मिथिला, जय मधेश, जय देश’ क अभियान बेसी उपयुक्त होयत । किएक जे मिथिला मधेशक तेहेन अभिन्न हिस्सा छैक, जेक देशसँ भिन्न नहि भ’सकैछ ।

-सम्प्रति लेखक मैथिली साहित्य परिषद् राजविराज, सप्तरीमे‌ं सचिव छथि ।

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