करुणा झा
बिक रहा है पानी,पवन बिक न जाए
बिक गयी है धरती, गगन बिक न जाए
चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए
हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति
डर है की कहीं धर्म बिक न जाए
देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए
हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता
कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए
सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद
डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए
आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं
डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए।