मोदी जी का जनकपुर दर्शन और एमाले–माओवादी कन्भर्जन कहीं एक पहेली तो नहीं… ?

मोदी जी का जनकपुर दर्शन और एमाले–माओवादी कन्भर्जन कहीं एक पहेली तो नहीं… ?
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प्रा.कैलाश महतो (परासी)
जब मधेश अपने अधिकार व आजादी की बात करता है तो जनमानस में एक रेडिमेड सवाल आता दिखता है कि भारत क्या सहयोग करेगा ? यह सवाल ज्यादा उन लोगों का है जिनके जेहन में ही कायरता और गुलामी का मनोरोग बैठा हुआ है । मुझे याद है जब हम संघीय गणतन्त्र के लिए आन्दोन के तैयारी में थे, तो वे ही लोग संघीयता कल्पना होने की बात करते थे जो आज स्वन्त्रता पर सवाल उठा रहे हैं । आश्चर्य की बात तो यह है कि वे ही कायर लोग आज संघीय प्रणाली में सारे जगहों पर विराजमान है ।
विश्लेषण ऐसा भी किया जा सकता है कि मोदी और ओली दोनों ही एक दूसरे के सामने कमजोर, निरीह, विवश, लोभी, स्वार्थी, हठी तथा यूज ऐण्ड थ्रो के सिद्धान्तों पर आधारित शतिm व नेतृत्व सावित होने बाले हैं । अपने अपने सिद्धान्त, हठ और यूज ऐण्ड थ्रो के मानसिकता से ओतप्रोत मोदी और ओली आमने सामने दिख चुके हैं, वहीं दोनों की मजबूरी और लोभ तथा स्वार्थ भी उतने ही बडे पैमाने का सावित होना तय है । एक तरफ मोदी बार बार जनकपुर दर्शन के लिए नकारे जाने के बाद भी सीता माता दर्शन के नाम पर जनकपुर आने का निमन्त्रणा को स्वीकार किये तो दूसरी तरफ ओली भी न चाहते हुए भी मोदी का जनकपुर सपना पूरा करने की छुट दे दी ।
नेपाल द्वारा मोदी जी के जनकपुर भ्रमण को जान बुझकर बार बार रोके जाने के कारण जहाँ मोदी जी ने जनकपुर आने का खयालात ही छोड दी थी, वहीं उन्होंने कुछ महीने पूर्व जनकपुर आकर चर्चा और प्रसिद्धी पाये किसी विदेशी कुटनीतिज्ञ को जबाव देने, मधेश को भारत के उपर भरोसा पनपाने और अपनी कुटनीतिक चाणक्यता फैलाने का काम किया है । उसी तरह ओली जी ने भी बडी होशियारी अपनायी है ।
ओली जी इस बात को अच्छी तरह जान चुके थे कि अपने सरकार को अगर टिकाये रखना चाहते हैं तो मोदी जी का धार्मिक इच्छा को पूरी कर दें । इससे उन्हें कई फायदे मिल जायेंगे । सरकार टिकाने के साथ साथ उन्हें अपने पार्टी में प्रचण्ड के पार्टी को सामेल करने, मधेशीे जनता की सेण्टिमेण्ट प्राप्त करने, मोदी जी को खुश करने और बदले में भारत से कुछ भिक्षा भी पाने की कार्य पूरी हो जायेगी ।
उसी तरह मोदी जी ने भी इस बात को दर्शाने में अपनी बहादुरी को प्रमाणित की है कि नेपाल में उनके सुरक्षा के खास बन्दोबस्त होने के बावजुद वे अपने तीन सौ कमाण्डोज् के साथ ही नेपाल प्रवेश की है । वे अपने कमाण्डोज् को उनके भारत चले जाने के बाद भी मुस्ताङ्ग में ही कुछ दिनोंतक छोडकर किसी को यह सन्देश देने में सफल हुए हैं कि नेपाल उसके बिना नहीं चल सकता । वहीं राष्ट्रभतm नेपाली जत्थाओं के लाख चिल्लाने के बावजूद भारतीय सैनिक उपयुतm समय मिलते ही नेपाल के भूमियों पर नजर रखने चल पडते हैं । भारत अपना काम कर लेता है और नेपाली राष्ट्रवाद को सिर्फ भारत के विरोध में गले फाडकर चिल्लाने का काम छोड जाता है ।
मोदी एक सशक्त देश के नेता होने के बावजूद नेपाल के सामने इतना विवश, मजबूर और त्रसित होंगे, इस बात का अन्दाजा किसी ने नहीं लगाया था । विश्व के अत्ति जानकार और अध्ययनशिल नेताओं में पडने बाले साहसी मोदी जी मधेश के सम्बन्ध में एक शब्दतक उच्चारण न करना मधेशी जनता द्वारा उनके आगमन की प्रतिक्षा होना और इतने सारे लगानी लगाना सब फिजुल की खर्चें होने की चर्चा हो रही है ।
मोदी जी का जनकपुर भ्रमण केवल जानकी जी की पत्थर की मूर्ति की दर्शन नहीं होनी चाहिए थी, अपितु सीता जी को प्यार और सम्मान देने बाले उनके वंशज और राजा जनक के सम्भ्रान्त राज्य में रहने बाली मधेशी जनता की सम्बोधन की भी आवश्यकता थी । ५६ इञ्च का सीना होने से ही कोई दमदार नहीं हो जाता जबतक उस सीने में वो दम न हो । साहस करने के लिए ५६ इञ्च का ही सीना होने की आवश्यकता नहीं होता । उसके के लिए ३६ इञ्च भी काफी है ।
मोदी जी का जनकपुर दर्शन और एमाले–माओवादी कन्भर्जन एक सोचा समझा रणनीति ही है, एक सुन्दर पहेली है, जिसे सब समझ नहीं सकते । मोदी और ओली एक दूसरे के काम के लिए तैयारी किए थे । एक दूसरे को प्रयोग करने के लिए वे योजना बनाये थे जिसमें मधेश का कहीं कोई स्थान नहीं रहा ।
मधेश में एक मानसिक विमारी है कि भारत के सहयोग बिना मधेश को कुछ नहीं मिल सकता । तो क्या यह तर्क करने बाले लोग इस बात का ग्यारेण्टी दे सकते हंै कि केवल भारत के ही सहयोग से मधेश को कोई अधिकार या आजादी मिल जायेगी ? संघीयता क्या भारत मात्र के सहयोग से मिला है ? धर्म निरपेक्षता भारत मात्र से संभव हुआ है ?
मधेश आन्दोलन क्या भारत से हुआ है ? वास्तविकता तो यही है कि मधेश ने अपने बल पर जो और जितनी भी उपलब्धियाँ पायी, भारत ने उसका सदुपयोग कर लिया । हमने अपने लडाई और उपलब्धियों को उसके कदमों डाल दी यह मानकर कि वो न्याय कर देगा । मगर उसकी मजबूरी है कि मधेश के शहादत को भी उसने अपने झोली में जकडकर नेपालियों से गठजोड कर लेने की इतिहास है । हमने अपने आन्दोलन और उससे प्राप्त उपलब्धियों को अपने पास रख पाने की हिम्मत नहीं कर पायी, जुगाड नहीं खोज पायी ।
मधेश को भारत परस्त होना छोडना होगा । मधेश का समस्या भारतीय नहीं है । जब मधेश का समस्या मधेश में है तो फिर हम भारत को दोष क्यों देते हैं, भारत पर निर्भर क्यों होते हैं ? भारत एक विशाल देश है, जिसका अपनी ही समस्या विशाल है । जो खुद हरेक मोड पर समस्याग्रस्त हो, उससे हम अनपेक्षित आशा नहीं लगा सकते । हम जब आत्मनिर्भर होकर आजाद होंगे, आत्मनिर्णय करेंगे तो भारत भी विश्वास के हमपर विश्वास करेगी । हमें सहयोग करेगी और समानता के आधार पर हमें मान्यता देगी । चाकडीबाजों को कभी सम्मान नहीं मिलता ।
भारत हमारा समस्या नहीं है और, न वह हमारा पूर्ण समाधान हो सकता है । समस्या हमारे अन्दर है । हमारे अन्दर रहे समस्याओं को जिस दिन हम समाधान खोज लेंगे, भारत हमारा मालिक नहीं, मित्र बनेगा । आजाद हमें होना है और गिडगिडाते हैं भारत से । बिमारी हमें लगी है तो गाली हम पडोसी को कैसे दे सकते ? अस्पताल, चिकित्सक और दबा की तलास तो हमें ही करना होगा न । मधेश को बिल्कुल बेफिक्र हो जाना होगा कि भारत, चीन या संसार का कोई और हमारे समस्याओं का समाधान तबतक नहीं कर पायेगा, जबतक हम खुद उसके लिए तैयार न हों ।
(लेखक महतो स्वतन्त्र मधेश गठबन्धनका केन्द्रीय सह–संयोजक हुन् ।)    

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