बुद्ध, तुम कब आओगे… ?

बुद्ध, तुम कब आओगे… ?
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कैलाश महतो
हर साल बैशाख में तेरे, याद में लोग चिल्लाते हैं,
उसी तिथि पर, उसी मिति पर, फरियाद लोग सुनाते हैं ।
न तुम होते हो, न वो दिन होता है, होता है दिखावा केवल,
संस्थायें होती हैं, संस्थापक होते हैं, जपते तेरे नाम के लेवेल ।

कैलाश महतो

बुद्ध आओ, देखो, देखो तुम्हारी दुनियाँ है कैसी,
तुमने हमें जो दुनियाँ दी थी, तेरी दुनियाँ अब न है वैसी ।
बिगडा तेरा घर संसार सब, क्यों किया किसपे ऐतवार तब ?,
आकर देखो वतन को अपने, कैसे हुए हैं चिरफार अब ।

वसुधा की वो सम्यक तुम्हारा, गुम हो गयी है वादों में,
कब आओगे, नयन बिछाये, बैठे हैं हम राहों में ।
याद न आओ, काम में आओ, महापरिनिर्वाण त्यागो तुम,
जन्मभूमि बना है बंजर देखो, नये अवतार में आओ तुम ।

तुम बने हो मूरत केवल, गोरख धन्धे तेरे नाम पर चलते,
वे करते हैं बिक्री तेरी, मालामाल वो बनते चलते ।
देख लो अपने चक्षु से फिर, शर्म से तुम मर जाओगे,
याद में आना छोड जा अब तुम, नहीं तो खुब पछताओगे ।

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