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नेपाली उपनिवेश और मधेश भारत सीमा की दास्तान

नेपाली उपनिवेश और मधेश भारत सीमा की दास्तान

प्रा. कैलाश महतो
अल्बर्ट आइन्सटाइन ने कहा था, यह दुनियाँ हड्डी और मांस से बने उस आदमी को हमेशा याद करेगी, जिसने अपने आत्मबल के बदौलत शान्तिपूर्ण तरीकों से दुनियाँ पर राज करने बाली बेलायती साम्राज्य को हिलाया ही नहीं, अपितु उसकी जडें उखारकर भारत से उसका नामो निशान मिटा दिया । वह है गाँधी, महात्मा गाँधी और आने बाले समय में कोई लोकतन्त्र की जग माने जाने बाली वह बेलायत, मानव अधिकार का ठेक्का लिए खडा वह अमेरिका, समाजवादी गणतन्त्र का जामा पहने वह रुस, स्वतन्त्र लोकतन्त्र का डंका पिटने बाला वह भारत और दुनियाँ को इंसाफ देने के लिए खडा वह राष्ट्र संघ जिन्होंने क्रमशः मधेश को नेपाली आक्रान्ताओं के जिम्मे लगाया, मानव अधिकार का घोर उलंघन होते देख भी चुप्पी साधा, अपने भिटो का गलत प्रयोग कर जवाहरलाल नेहरु के गलत निर्णय पर सहमति जताया, अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन का मार खाए हुए भारत ने भी मधेश को आजतक अपना गोटी कार्ड बनाया और अनपढ, गवाँर और अवैज्ञानिक भ–ूअध्ययनवेत्ता के तरह मधेश को नेपाल का अंग बनाने बालों को बेइमान साम्राज्यवादी बेलायत, मानवता विरोधी अमेरिका, नक्कली समाजवादी रुस, मधेश कार्ड धारक भारत और आलसी एवं अध्ययनहीन राष्ट्रसंघ न कहेने लगें ।
उन्नीस दशकोंतक सन् १७५७ से १९४७ तक) भारत में प्रत्यक्ष शासन किये अंग्रेजों ने भारत छोड चले जाने के बाद भारत जब आजाद हो जाता है तो अंग्रेजों के ही अधिनस्थ रहे मधेश उनके बेलायत वापस हो जाने के बाद भी गुलाम होना बेलायत और भारत दोनों के लिए एक गम्भीर सवाल है ।
नेपाली विभिन्न समाचार क्षेत्र तथा च्यानलों पर आजकल दिखाये जा रहे समाचार तस्वीरों से जो सत्य तथ्य दिख रही हैं, संभवतः दुनियाँ के किसी भी देशीय, त्रिदेशीय, या फिर चतुर्देशीय सीमाओं पर नहीं देखा जा सकता । एक ही खेत दो देशों नेपाल अधिनस्थ मधेश और भारत) में और एक घर समेत दोनों देशों में पाया जाना विचित्र मगर अपराधिक रुप में एक परिवार को दो भागों में विभाजित किया गया एक अटुट सत्य जाहेर करता है । तथाकथित नेपाल और भारत के बीच अंग्रेजों द्वारा एकतर्फी निर्मित दक्षिण सीमा के दर्जनों जगहों पर दोनों देशों के दोनों नागरिकों के घर और खेत खलिहान पडते हैं । क्या यह किसी भी मायने में प्राकृतिक है ? वैज्ञानिक सीमा हो सकता है ? यह क्या संकेत करता है ?
सन् १८१४ से १८६० तक अगर अंग्रेजों को भितरी भारत में भारतीय लोगों से भीषण लडाई न करनी पडती तो आज के नेपाल अधिनस्थ मधेश भी भारत का ही हिस्सा न होने की कोई दुविधा न होती । मधेशियों के दो दुर्भाग्यों ने उसके मधेश के एक भाग को अंग्रेजों ने नेपाली आक्रान्ताओं के जिम्मा लगा दिए । पहला यह कि मधेशियों ने अन्य भारतीयों के तरह ही अंग्रेज और नेपालियों से नहीं लडे । दूसरा, अंग्रेजों ने मध्यदेश के एक हिस्से को अपने राजनीतिक फायदों के लिए दो लाख रुपयों के बदले नेपालियों को उसे जोतकर उतने दो लाख) रकम अपने पास रखते हुए बाँकी के रकम अपने ‐अंग्रेज के लिए उन भूमियों से वसूल करने हेतु नेपाल को तबतक के लिए दे दी जबतक भारत में उसकी स्थायी शासन कायम न हो जाता ।
पर्सा में आज ५० बिगहा नेपाली भूमि भारत द्वारा अतिक्रमित होने का जो समाचार बनाया जा रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ मधेशी पार्टी और मधेशी जनता के उपर प्रश्न खडा करने की साजिश है । बेचारा मधेशी जनता सोझ सपाट होने के कारण उसके जेहन में राष्ट्र और राष्ट्रियता का एक इंजेक्शन लगा दिया जाता है और बेचारे उस नशे में राष्ट्र और राष्ट्रियता का गीत इस तरह गाने लगते हैं मानों वे अराष्ट्रिय तत्व हैं जो उसके इंजेक्शन के बाद ही राष्ट्रभक्त बन पाता है । वे नेपाल राष्ट्र और राष्ट्रवाद का पक्ष पोषक तब ही बन पाता है जब उसे उसी के भूमियों पर राजनीति करके उसे राष्ट्रवाद का नशा खिलाया जाता है । जब जब मधेश की भूमियों की रक्षा और इसकी अस्मिता की बचाव करने तथा मधेश राष्ट्र की बात छिडती है, नेपाली शासक बडे होशियारी पूर्वक मधेशियों को उस शक्ति से भिडने को लगा देता है, जहाँपर संसार में बडे मान के बीर गोर्खाली सेना काँपती है । सरकार अक्क न बक्क हो जाती है ।
बर्षात के पानी और बहाव से सुरक्षा पाने के लिए भारत से मधेशी लडें, बाँध और तटबन्ध के विरोध में मधेशी अपनी जान गवाँये, सुस्ता, ठोरी, तिलाठी लगायत के भूमि रक्षा के लिए मधेशी आवाज उठाये और काठमाण्डौ में ऐशो आराम में पल रहे राष्ट्र और राष्ट्रवाद का नारा देने बाले शासक लोग मधेशी जनता को उक्साकर भारत से दुश्मनी लेने को पाठ पढायें ।
संसार में बीर गोर्खाली और कहीं किसी से न डरने बाली नेपाली सेना, सीमा सुरक्षा का जिम्मा लिये सशस्त्र प्रहरी और जनता को सुरक्षा देने बाली जनपद प्रहरी सिर्फ जागिर पाने, पैसा कमाने और मधेशियों को सताने के लिए ही निर्मित है तो फिर मधेशी जनता को सतर्क होना बेहद जरुरी है । क्योंकि मधेशी जनता को यह बात समझनी होगी कि विश्व में बीर गोर्खाली के नामपर जागिर पाकर मधेशियों का दोहन करने बाली सेना और सीमा सुरक्षा बल सशस्त्र प्रहरी मधेशियों के साथ धोखा कर रही हैं । नेपाली शासक यह चाहता है कि सीमा से सटे मधेशियों की जो भूमि है, उसके रक्षा के लिए मधेशी को ही लडाने से उसे फायदे हैं । पहला फायदा यह है कि शतिmशाली किसी विदेशी सेना से नेपाली सेना को लडना न पडे ता कि उसकी बहादुरी की संज्ञा फोकट में ही कायम रहे । दूसरा यह कि भारत सरकार और उसके प्रशासन से नेपाली शासकों का प्रत्यक्ष मुठभेड न हो पाये ता कि नेपाली शासक और भारत के बीच समझदारी बनी रहे । तीसरा और सबसे अहम कारण यह है कि मधेशी जनता यदि भारतीय जनता, उसके प्रशासन और भारत सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने या द्वन्द करती है तो बिना कोई नोक्शानी नेपाली शासकों को फायदे ही फायदे हैं । क्योंकि नेपाल बखुबी जानता है कि मधेशी लोग कृषि, व्यापार, लत्ता कपडा और दैनिक जीवन यापन के सामानें भारत से ही लाते हैं । अगर भारत से मधेशियों का बराबर टकराव कायम रहा तो उसके कृषि प्रयोजन के साथ साथ व्यापार और दैनिक जीवन यापन के सामानों को भारत से मधेश में लाने देने में भारत सरकार, भारतीय जनता और उसकी प्रशासन दिक्कतें खडी करेंगी, जिससे मधेश का कृषि और व्यापार चौपट होंगे । महँगाई बढेगी । मधेश का आर्थिक अवस्था तहसनहस होगा और तब जाकर मधेश में नेपालियों राज और ज्यादा मजबूत होगा । मधेश की बाँकी भूमियों पर भी उसकी मालकियत बढेगी और मधेशी पलायन हो जायेगा ।
मधेश को एक और बात पर गौर करना होगा कि भारतीय रिश्तेदारों व बाजारों से मधेशी जब घर लौटता है तो उसके पास रहे छोटे से छोटे प्लाष्टिक के झोलेतक को भारत मधेश सीमा से लेकर दश किलोमिटर अन्दरतक चेक होती है । मगर नेपाली मूल के कहे जाने बाले लोगों के साथ सहुलियत व्यवहार होती है या फिर उससे पूछाताछ तक नहीं की जाती है । जो भी दुव्र्यवहार होता है, मधेशियों के साथ । क्यों ? क्योंकि मधेशियों को नेपाली नहीं माना जाता ।
यह नेपाली उपनिवेश और मधेश भारत सीमा की दैनिक दास्ताँयें है । हमें याद करना होगा कि दर्जनों बार आतंक के चपेट में आये भारत में एक बार प्रवेश करने के बाद भारतीय सुरक्षाकर्मी कोई परेशान नहीं करती है । मगर कंगाल और भिखारी नेपाली राज्य में कौन सा खानी या अपार सम्पतियों की खजाना पडे हंै जिसे लुटने या तवाह करने के लिए भारत से मधेशी हथियार लाता है ? यह भारत की भी मान हानी है ।
अभी कुछ दिन पूर्व ही सम्पन्न निर्वाचनों को सुरक्षा के नामपर मधेश में सारे सुरक्षा निकायों के साथ साथ बीर बहादुर नेपाली सेना को भी मधेश के गल्ली गल्ली हथियारों से लैश कर मधेशियों में त्रास फैलाने के लिए उतारा गया था । मगर जब देश की सीमा की चीर हरण होती है तो सेना की बीरता कहाँ गायब हो जाती है ? जिस सुरक्षा के नामपर मधेशी जनता अरबों रुपये लगानी करती है, उस जनता और उसके सम्पतियों की सुरक्षा नेपाली सेना और अन्य सुरक्षा निकाय क्यों नहीं करती ? क्या उन्हें सिर्फ मधेशियों को तर्साने के लिए ही पाला जा रहा है ?
(लेखक प्रा. महतो स्वतन्त्र मधेश गठबन्धनका केन्द्रीय सह–संयोजक हुन् ।)

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लेखक यादव पत्रकारिताका साथै भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, पर्यटन, ऐतिहासिक एवम् पुरातात्विक क्षेत्रमा कलम चलाउँछन् (सं) ।