कुछ जडता भी मूढताः यह एक विमारी हीं है

कुछ जडता भी मूढताः यह एक विमारी हीं है
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कैलाश महतो

कैलाश महतो
परासी
यह जरुरी नहीं कि ब्रामहण के सन्तति ब्राम्हण ही हो, सन्त का बेटा भी सन्त ही हो । लोकतन्त्र का उत्पादन लाकतान्त्रिक ही हो और कम्यूनिष्टों के सन्तान भी साम्यवादी ही हो । मानव समाज के इतिहासों में बडे बडे शुद्र और अपराधी ब्राम्हण हुए हैं तो वहीं बडे बडे ब्राम्हणों और हस्तियों के परिवार में भी अपराधी और शुद्र पैदा हुए हैं ।
जन्म और स्वाभाव से मानव ही नहीं, अपितु समस्त प्राणी भी शुद्र ही होते हैं । शुद्र से उपर उठने के लिए मानव को कर्म निर्धारण करने पडते हैं । कभी कभी खुंखार जानवर में भी उच्च भाव दिखता है जो कभी कभार मानव से भी श्रेष्ठ सावित होता है । मनु को भले ही कुछ लोग गालियाँ देते हों, पर उन्होंने मानव को जिन चार वर्णों में बाँटा है, वह वैज्ञानिकता है । कुछ लोग उन्हें ब्राम्हण कहते हैं । जबकि वे जन्म से ब्राम्हण थे ही नहीं । वे एक प्रकाण्ड विद्वत् ऋषि थे जिन्हें तत्कालिन समाज ने अपना सम्राट बनाया था । उनके ही सन्तति इक्ष्वाकु, ओकाका, ओकामुखा, मिथी, निमी, शिरध्वज, अज, दशरथ, शाक्य वंश आदि रहे तो वे ब्राम्हण होने की बात ही नहीं होती है । हाँ, उनमें ज्ञान थी । श्रेष्ठता थी । ब्रम्हत्व था । ब्रम्हत्व के हिसाब से उन्हें ब्राम्हण कहा जा सकता है । मगर वे बाभन नहीं थे । ब्राम्हण और बाभन एक नहीं हो सकते ।
चूँकि मनु सम्राट थे । व्यतिm, परिवार, समाज और मध्य देश के अपने प्रशासनिक इकाइयों में लोगों को उनके काम के आधार पर उन्होंने चार वर्णों में विभाजित की । उनके विभाजन ने किसी भी वर्ण को किसी वर्ण या वर्ग से नीच या ओछ नहीं दिखाया था । उनके अनुसार सारे वर्ण के लोग अपने अपने कामों में निपूण होना था और सबको एक दूसरों का सम्मान करना था । उनके राज्य में शुद्र के बिना कोई ब्राम्हण होने की अवस्था ही नहीं थी, तो वहीं वैश्य के बिना किसी को क्षत्री होना भी असंभव था । आज से तकरीबन नौ सौ वर्ष पहले बाभनों ने चार वर्णों को टुकडे कर अनेक दुष्परिणमों से समाज को गन्दे कर दिये ।
पौराणिक इतिहासों को गहण अध्ययन करने बाले विद्वान् लोग यही कहते हैं कि जन्म के समय सारे मानव शुद्र ही होते हैं । अगर शुद्र न हो तो ब्राम्हण, क्षत्रि या वैश्य की कल्पनातक नहीं की जा सकती । क्योंकि हर आदमी शरीर के शुद्र स्थान से ही पैदा होता है । सम्राट मनु ने एक व्यतिm को ही चारों वर्णों से परिभाषित की है । उनके अनुसार ः मनुष्य का मस्तिष्क–ब्राम्हण, छाती–क्षत्री, पेट–वैश्य और पेट से तल के भाग शुद्र है । ंनीचे के पैर बाले अंङ्ग, जिनपर हम खडे होते हैं, हमारे बुद्धि, साहस और पेट समेत को वे थामकर रखते हैं । वह भी शुद्र ही है । यूँ कहें तो शुद्र नहीं तो जीवन होकर भी किसी मूल्य के नहीं ।
मनु ने यह बात कही है कि कोई व्यतिm जन्म से ब्राम्हण नहीं हो सकता । चारो वर्णों को उन्होंने संसार कहा है जो कभी स्थिर नहीं रहता । वे गोलाकार वृत में घुमते रहते हैं । वृताकार के परिधी में घुमने बाली चक्र को ही संसार कहते हंै । कर्म के आधारपर आदमी का वर्ण बदलता रहता है । कर्म के आधारपर ब्राम्हण शुद्र बन जाता है, शुद्र ब्राम्हण । वैश्य ब्राम्हण बन जाता है और क्षत्री शुद्र ।
इसी बदलाव के कारण संसार में विकास होती है । हाँ, विकास का रुप सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकते हैं । व्यतिm में विकास सकारात्मक हो तो उसे प्रसिद्धी मिलती है और नकारात्मक विकास उसे दुर्गती देती है । मानव इतिहास में ही रावण की शुरुवात ब्रम्हत्व से हुई और अन्त शुद्रत्व में । वहीं बदमाशी और अपराध के देवता रहे रत्नणाकर और अंगुलीमाल के कर्मों में आये सुकर्म ने उन्हें ब्रम्हत्व उपलब्ध करा दी और वे ब्राम्हण हो गये ।
बदलना स्वाभाव है । जीवन है । जीवन है तो बदलना होगा । बदलाव को स्वीकारना होगा । नहीं बदलना जडता है । जडता मूढता है और मूढता एक प्रकार की बिमारी है । हर शुद्र ब्राम्हण हो सकता है । बस्, उसे शुद्रता छोडनी होगी । और शुद्रता छोडना कम साहस की बात नहीं है । उसके लिए मेहनत करनी पडती है । संघर्ष करना पडता है । पूराने बेकाम के परम्पराओं को छोडने पडते हंै । जोखिम मोल लेना पडता है और खतरे को मित्र बनाना पडता है । बिना कोई रिष्क कोई बुद्ध नहीं हो सकता । बिना जोखिम कोई गाँधी नहीं बन सकता । बिना जेहाद छेडे कोई सुवासचन्द्र बोस नहीं बनता । बिना खतरा कोई अम्बेडकर नहीं हो सकता । और बिना झमेले न कोई मण्डेला कहलाता । बदलना ही शास्वत सत्य है । जडता को छोडना ही आगे की यात्रा हो सकती है ।
कुछ लोग अपने जडता को ही मर्दानगी समझते हैं । एक ही जगह पर रहना अपने को प्रतिष्ठित मानते हैं । किसी का जगह बदलना उनके लिए भगौडेपन होता है । जबकि अवस्था के अनुसार अपने को बदलना बुद्धिमानी होती है । क्या यह प्रतिष्ठा या कोई बुद्धिमानी की बात हो सकती है कि एक व्यक्ति का महल बाढ से घिरने बाला हो, वह महल ढहने बाला हो और वह यह कहें कि मैं अपना जगह नहीं बदल सकता । हम अपने परिवार को यहाँ से दूसरे जगह नहीं ले सकते । क्योंकि हमने महल में लाखों की लगानी लगायी है । दशों पुस्ता से इस घर में बस रहे हैं । कोई भी व्यतिm या परिवार उस घर में नहीं रह सकता जो घर खतरों मे हों ।
क्या एक बेटी अपनी मायके को नहीं छोडती ? क्या जीवनभर वो अपने मायके में रहती है ? क्या एक बच्चा हमेशा अपने मातापिता के साथ ही रहता है ? क्या वह विद्रोह नहीं करता ? वह विद्रोह करता है । उसके विद्रोह से एक विकास की मूल फुटती है । बेटी जब अपने जन्म घर को छोडती है तो नयाँ संसार की निर्माण होती है । हम उसे भगौडेपन नहीं कह सकते ।
राजनीतिक कुछ नेता लोग यह कहते सुना जाता है कि बहुत सारे लोग एक पार्टी या संगठन को छोडकर दूसरे में चले गयें । मगर वे जहाँ थे, वहींपर हैं । बहुत लोग बदल गये, लेकिन वे नहीं बदले । वे सिद्धान्तवादी हैं, बिकाउ नहीं । बडे भोलेभाले लोग हैं वे । यूँ कहें तो जडता को कपडे हुए अज्ञानी हैं वे । मूढता में जिने बाले इमानदार बेइमान हैं वे ।
हकिकत यही है कि वे इमानदार लोग नहीं बदले तो क्या हुआ ? बदलने बाले लोग बहुत बदल गये । उनके पार्टींयों की बहुत सारे मूल्य, मान्यता और विधी विधान बदल गये । नेतृत्वाों के चरित्र बदल गये । उनके भाषा, सोंच, तर्जुबा, नियम, नीति, नियत और रंङ्गढंङ्ग बदल गये, और वे बेचारे उसी चौराहे पर उन वेश्याओं के शुद्धता के प्रतिक्षा में खडे खडे जिन्दगी बिता रहे हैं जो अपने मौलिक स्थानपर लौटकर आने बाले हैं नहीं, और अगर आ गये तो एड्स जैसे कई खतरनाक बिमारियाँ लाना तय है ।
जो लोग यह जताने में गर्व करता है कि उन्होंने आजतक अपनी पार्टी नहीं बदली, एक ही जगहपर स्थिर रही तो उन्हें यह हिसाब निकालना होगा कि वे अपने एक ही संगठन में रहकर अपने समाज को क्या दिये ? क्या वे यह नहीं जानते कि वे समाज को न भौतिक कोई सम्पन्नता दे पाये, न इमानदार बना पाये ?
उन्हें यह खोजना होगा कि वास्तव में वे इमानदार ही हैं या बेइमान भी ? एक आदमी के बेइमानी से अगर उसके समग्र समाज व समुदाय का हित और विकास होती है तो वैसे बेइमानी को स्वीकार लेना ही मर्दानगी और बहादुरी दोनों है । वही धर्म है । यूँ कहें तो वे लोग इमानदार कैसे हो सकते जो अपने आँखो के सामने अपने समाज के उपर हो रहे अत्याचारों को सहन कर अपने समाज को धोखा देते हों ? वह इमानदारी नहीं, पाखण्ड और नामर्दगी है ।
मधेश विरोधी नेपाली पार्टिंयों में रहे कुछ मधेशी इमान का चोला पहने कायर नेताओं से मधेश के पक्ष में आने और उसके हित में अन्य विकल्प ढूँढने के लिए जब अनुरोध की जाती है तो तपाक् से उनके तरफ से आवाज आती है कि वे पार्टी बदलू नहीं हैं । वे जिस पार्टी में हैं, उसमें उनका लम्बी लगानी है । उनके बाप दादाओं से लेकर वर्तमानतक वे वहीं हैं और वहीं रहना इज्जत की बात है । ंउन्हें यह हिसाब निकालने नहीं आता कि जितने दशक से उनके बाप दादा और वे समेतों ने जिन नेपाली पार्टियों में लगानी की है, उसने मधेश से क्या लिया और मधेश को क्या दिया ? फुटे मैले कटोरे और फटे लंगोटी लेकर मधेश आए नेपाली नेताओं की अरबों की दौलत कहाँ से आ गयी और समृद्ध मधेश के सम्पन्न मधेशी फटेहाल क्यों और कैसे हो गये ? मधेशी नेताओं के इमानदारी से मधेश को क्या मिला और मिलने बाला है ?
क्या एक रोगी को उस डाक्टर के प्रति इमानदार होना चाहिए जो डाक्टर उसका इलाज इमानदारी से नहीं करता हो या बहला फुसलाकर इलाज के नाम पर उसके पैसे ऐंठ रहा हों ? क्या वह रोगी अपने जीवन रक्षा या स्वस्थ्य जीवन पाने के लिए डाक्टर परिवर्तन करें तो उसे डाक्टर बदलू कहेंगे ?
हाँ, एक बात याद रखना होगा कि पार्टी बदलने बाला कोई विजय गच्छदार न हो, ह्रृदयेश त्रिपाठी न हो, प्रचण्ड जैसे मधेश का बेटा न होे और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक रुप में रणनीतिक फायदे उठाने बाले उपेन्द्र यादव, राजेन्द्र महतो और सर्वेन्द्रनाथ शुक्ला न हो ।
(प्रस्तुत लेखमा उल्लेखित विषयवस्तु लेखकको निजी विचार हो । (सं )

 

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