

प्रा. अमरकान्त झा
सत्ता परिवर्तनकसंगहि आन्दोलनरत मधेशी, थारु, एवं अन्य जनजाति समुदायसबमे समान अधिकार प्राप्तिक आश जागल अछि । साझेदार माओवादी केन्द्र आ ने.का. दूनूक नेतृत्व वर्ग स्पष्टतः ई बातकेँ महशूस करैत छथि जे संविधानमे आवश्यक संशोधनद्वारा आन्दोलनकारीसबहक मांगक उचित सम्वोधन कएलेसँ संविधानकेँ कार्यान्वयन भए सकत, देशक विकास आ समृद्घिक मार्ग खुजि सकत एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर देशक छवि सुधैर सकत । वर्तमान समयमे, चीनकसँग सौहार्दपूर्ण सम्वन्धकेँ यदि कूटनीतिक सफलता मानि तँ भारतसहित अन्य विश्व समुदायकसङ्ग सम्बन्धकेँ देशक कूटनीतिक विफलते मानल जएतँैक । तकर मूल कारण अछि देशक आन्तरिक समस्या जे संविधानसँ सम्वन्धित छैक जकरा संकीर्ण सोचक कारण देशक तीन पैध दलक नेतृत्व वर्ग सुलझा नहि सकल छथि । जनआन्दोलन (दोसर) आ तत्पश्चात संक्रमणीय अवस्थामे भारत, अमेरिका, ब्रिटेनसहित युरोपीय महासंघक अन्य राष्ट्रसबहक भरपूर सहयोग रहलाक वावजूद ई राष्ट्रसबहक आग्रह जे मधेशी, थारु, अन्य जनजाति, आदिक मांगक उचित सम्बोधन होए ताहि सुझाओकेँ देशक आन्तरिक मामिलामे हस्तक्षेप कहि मित्र राष्ट्रसबकें लाञ्छित कए ओकर सबहकसङ्ग रहल सम्बन्धमे कटूता उत्पन्न कएल गेल । तें, देशक आन्तरिक एवं बाह्य समस्यासबहक निदान आन्दोलनकारीसबहक मांगक उचित सम्बोधनेसँ जोडल होएबाक कारण पुष्पकमल दहाल–‘प्रचण्ड’ क नेतृत्वमे नव गठित सरकार अपन कार्यसूचीमे आन्दोलनकारीद्वारा उठाओल राजनैतिक मुद्दाकेँ उच्चतम प्राथमिकतामे राखने अछि ।
आन्दोलनरत पक्षक राजनीतिक मांग संविधान संशोधनेद्वारा सम्भव अछि आ तकरलेल विशेषतः तीन पैघ दलसबहकबीच सहमति आ सहकार्य अपरिहार्य अछि जे हासिल करब नव सरकारकलेल निश्चितरुपमे अत्यन्त कठिन अछि । एमाले यथास्थितिवादी सोच एवम् खस नश्लवादी राष्ट्रीयतामे दृढ रहि तराई–मधेशमे दूटा प्रदेशक निर्माणविरुद्घ रणनीति तैआर करएमे केन्द्रीत होएवाक कारण एहि दलक सहयोग प्राप्त करब जरुर मुश्किल होएत । एकर अतिरिक्त, स्वयम् माओवादी केन्द्र एवम् नेकाँक अधिकांश नेता–कार्यकर्तालोकनि, काठमाण्डुक वुद्घिजीवी तथा सञ्चारकर्मीलोकनिमे सेहो यथास्थितिवादी चिन्तनसँ जकडल मानसिकता होएबाक कारण ई सबहक सहयोग प्राप्त करब ओतने कठिन होएत । तखन सरकारमे सहयोगी दूनू पैघ दलक शीर्ष नेतालोकनि अपन–अपन दलकें समटैत ईमान्दार एवम् अथक प्रयास करैथि तँ एमालेक सेहो देर–सबेर सही रास्तामे आबए पडतैक एवम् सहमतीक आधारपर आन्दोलनकारीसबहक मांगकें संशोधनद्वारा सम्बोधन करए पडतैक । आखिर तीनू पैघ दलक शीर्ष नेतालोकनि जरुर महशूस करैत होएताह जे कोन तरहें जनआन्दोलन (दोसर) क ६–सूत्रीय ऐतिहासिक दस्तावेज, माओवादीसङ्ग कएल १२–सूत्रीय सम्झौता, मधेशी, थारु एवम् अन्य जनजातिसङ्ग नेपाल सरकारक समझौता, आदिमे उल्लेख भेल उपेक्षित समूहसबहक अधिकार जे अन्तरिम संविधान (२०६३) मे लिपिबद्घ भेल एवम् पैघ दलसबहक संविधानसभा चुनावी घोषणापत्रमे उल्लेख भेल समग्र नेपाली जनताक सशक्तीकरणसम्बन्धी आश्वासन, आदि सबटाकेँ बिसैर ई दलसब ह्वीप जारी कए नामेटाक ९० प्रतिशतसँ वेशी सभासद्लोकनिद्वारा चालाकीसँं खस नश्लवादी, विभेदपूर्ण संविधानक निर्माण करौलैन्हि। एहि सम्बन्धमे तीन पैघ दलसहित दस्तावेज एवम् समझौता आदिमे हस्ताक्षरकर्ताक रुपमे रहल छोटोदलसब – चित्रहादुर आले (के.सी.)क जनमोर्चा नेपाल, सी पी मैनालीक संयुक्त बाममोर्चा, नेपाल एवम् नेमकिपा – विचार करए जे नेपाली जनताकेँ कोन तरहें ई दलसब मिलकए विश्वासघात कएलक ? तें, आन्दोलनकारीसबहकोलेल नव संविधान स्वीकार योग्य होए ताहिहेतु विभेदपूर्ण संबैधानिक प्रावधानकें हटाकए एकरा समावेशी लोकतान्त्रिक संविधानअनुरुप परिमार्जन करए हेतु भागीरथी प्रयासमे छोट–पैघसब जनपक्षीय दल एकजुट होए ।
नव संविधानमे सबसँ विभेदपूर्ण प्रावधान सात प्रदेशक सीमांकन अछि । ई सातो प्रदेशक जनसांख्यिक स्थिति देखलासँ स्पष्ट होइत अछि जे सप्तरीसँ पर्सातकक भूभागमे रहल प्रदेश नं. २ कें छोडि बाँकी ६ प्रदेशमे खस–आर्य (पहाडी ब्राह्मण, क्षेत्री, ठकुरी आ दशनामी)क बाहुल्य छैक जाहि कारण ई पहाडी उच्च जातिकें सदियोसँ रहल सत्तामे एकाधिकारक निरन्तरता रहत । एकटा टि.भी. कार्यक्रममे एमाले नेता माधव कुमार नेपाल सीमांकनकें उचित ठहराबैत गैर–जिमेवारीपूर्ण ढङ्गसँ कहलैन्हि जे ई प्रदेशसबमे खस–आर्यक जनसंख्या वेसी छैक तकर कोन उपाय ? असलमे, तराई–मधेशक पूर्वीय तीन जिला एवं पश्चिमक ९ जिलाकें संघीय सिद्घान्तविपरीत भौगोेलिक एकरुपताकें ध्वस्त कए पहाडसङ्ग समीश्रण कए कृत्रिम स्वरुपक छटा प्रदेशक निर्माण कएलासँ एहि क्षेत्रक करिब ३७ लाख तराई–मधेशवासीसहित राई, लिम्बू, मगर, गुरुङ्ग, आदि जनजाति समुदायसब अल्पसंख्यक भए सत्ताके पहुचसँ बाहर रहत । सीमान्तकृत समुदायसब एक पहिचानक आधारपर राज्यक पूनर्संरचनाक मांग उठाबैत रहल अवस्थामे तकरा नहि सुनि खस–आर्यक एक पहिचानक रुपमे रहल पश्चिमी पहाडी क्षेत्रमे दूटा प्रदेश (प्रदेश नं. ६ आ ७) क निर्माण होएब कतेक जाएज मानल जाएत ? बास्तविकता ई अछि जे जँ साते प्रदेशकें सही ढङ्गसँ सीमांकन होए जाहिमे तराई–मधेशमे झापासँ पर्साधरि एवम् चितवनक दक्षिणी भागसहित नवलपरासीसँ कञ्चनपुरधरिमे दूटा प्रदेशक निर्माण होए एवम् बाँकी ५ टा प्रदेश हिमाल–पहाडक क्षेत्रमे निर्माण होए त एहेन संघीय ढाँचासँ सघन बसोबास कएनिहार समुदायसब–मधेशी, थारु, राई, लिम्बु, नेवार, तामाङ्ग, मगर, गुरुङ्ग एवम् खस–आर्य– सत्तामे समानुपातिक ढङ्गसँ पहुँच बनबएमे सफल होएत एवम् राज्यक पुनर्संरचनो सार्थक होएत (नव संविधान–दावा आ’ वास्तविकता, अप्पन मिथिला, पुष–माघ, २०७२) ।
तहिना, प्रतिनिधित्वक सबालमे जनसंख्याक कोनो विचार नहि कए राष्ट्रीयसभाकलेल धारा ८६ (२ क) अनुसार प्रत्येक प्रदेशसँ ८ सदस्यकेँ निर्वाचित करक प्रावधान स्पष्टतः पक्षपातपूर्ण अछि । प्रदेश नम्वर– ६ आ ७ (दूनूक कुल जनसंख्या करीब चारि लाख) सँ ८–८ अर्थात् १६ सदस्य एवम् कुल जनसंख्या करीब चौबन लाख रहल खण्डित मधेशी भू–भागबला प्रदेश नं. २ सँ सेहो आठेटा सदस्यक चयनक व्यवस्था हास्यास्पद अछि । तें, मधेशी मोर्चाक ११–सूत्रीय मांगमे समावेश भेल जनसंख्याक आधारपर एक संक्रमणीय निर्वाचन पद्घतिअनुरुप राष्ट्रीयसभाक सदस्यलोकनिक व्यवस्था न्यायोचित एवम् अन्तर्राष्ट्रीय अभ्यासअनुरुप होएत ।
एहि प्रसंगमे, नव संविधानक पहिल संशोधनक चर्च आवश्यक अछि । आन्दोलनरत मधेशी समुदायकेँ भ्रमित करक हेतु पिछडल एवम् उत्पीडित विभिन्न समूहकें राज्यक सब अंगमे सहभागिताक हकसम्बन्धी धारा ४२.१ एवम् निर्वाचन क्षेत्रक निर्धारण सम्बन्धी धारा ८४ (१क) कें तीन पैघ दलक सक्रियतामे संशोधन कएलोपश्चात विभेदकारी अवस्था काएमे रहबाक कारण मधेशी मोर्चा एकर स्वामित्व ग्रहण नहि कएलक । ‘सामाजिक रुपमे पिछडल, महिला, दलित, आदिबासी, आदिबासी जनजाति, मधेशी, थारु’ सहित ‘युवा,’ ‘किसान,’ ‘श्रमिक,’ ‘आर्थिक रुपमे विपन्न खस आर्य,’ आदि विभिन्न समूहसबकें एके धारामे राखल जएबाक कारण राज्यक विभिन्न अंगमे समानुपातिक सहभागिताक सबाल अस्पष्ट एवम् सन्देहास्पद छैक । संगहि, ‘आर्थिक रुपमे विपन्न वर्ग’क स्थानपर ‘आर्थिक रुपमे विपन्न खस–आर्य’क प्रयोग स्पष्टतः पक्षपाती प्रावधान छैक । तहिना, संशोधित धारा ८४ (१ क) मे ‘भूगोल एवम् जनसंख्याका आधार’ क स्थानपर ‘जनसंख्या एवम् भौगोलिक अनुकुलता तथा विशिष्टताक आधार’ शब्दाबलीमे शब्दक स्थान परिवर्तन भेल अछि जाहिसँ जनसंख्याक आधारपर तराई–मधेशमे निर्वाचन क्षेत्रक निर्धारणक कोनो सुनिश्चिता नहि अछि । अन्तरिम संविधान (२०६३) क धारा ६३ (३ क) अनुसार तराई–मधेशमे काएम रहल जनसंख्याक आधारपर निर्वाचन क्षेत्रक निर्धारण करक व्यवस्था दूनू संविधानसभाक निर्वाचनमे कएल गेल छल, ताहिसँ नव संविधानमे तराई–मधेशबासीकें बञ्चित राखव अन्यायपूर्ण होएत ।
तहिना, संघीय एवम् प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषाक सम्वन्धमे धारा ७ (१.२) मे नेपाली भाषाक पक्षमे एक–भाषा नीतिकें केन्द्रमे राखि देशक अन्य भाषाक उपेक्षा कएल गेल अछि । उक्त धारामे नेपाली संघीय सरकारक कामकाजक भाषा एवं, नेपालीक अतिरिक्त, बहुसंख्यकद्वारा बाजल जाएबला एक वा एकसँ बेशी अन्य राष्ट्रभाषा प्रदेशक कानून बमोजिम प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषा निर्धारण कएल जा सकैत अछि ।
एहिसँ संघीय आ प्रादेशिक सरकार दूनूमें कामकाजक भाषा खस–आर्यक सशक्त पहिचानक रुपमे रहल नेपाली भाषा होएत ताहि बातक सुनिचितता अछि । किन्तु संघीय सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे देशक अन्य भाषाक स्थान त नहिएटा अछि, प्रादेशिको सरकारक कामकाज भाषाक रुपमे नेपाली अतिरिक्त प्रदेशक एक वा एकसँ बेशी अन्य भाषाक सम्बन्धमे जे प्रावधान राखल गेल अछि व्यवहारिक कारणसँ ओकर सबहक प्रयोग सम्भव नहि होएत । किएक त प्रादेशिक सरकार नेपालीसहित एक वा एकसँ बेसी भाषाकें आर्थिक एवम् अन्य दृष्टिसँ कामकाजक भाषाक रुपमे प्रयोग करएसँ असमर्थ होएबाक कारणें नेपालीएटा संघीय एवम् प्रादेशिक दूनू सरकारक कामकाजक भाषा होएत । जाहिसँ समग्र देशमे एक–भाषा नीतिक निरन्तरता रहत । राज्यद्वारा करिब २४० वर्षसँ अपनाओल एक भाषा नीतिक दुष्परिणामस्वरुप करीब २४ लाख जनजाति समुदाय अपन मातृभाषा परित्याग कए नेपालीकें ग्रहण कएलक जाहि कारणे बहुते जनजातिक भाषा, खासकए, राई परिवारक भाषा, लोप भेल वा लोपोन्मूख स्थितिमे अछि । तें, कोनो रुपमे एक भाषा नीतिकें जारी राखब थारु–मधेशीसहित कोनो गैर–नेपाली भाषाभाषी समुदायक लेल कतेक हानिकारक होएत तकर सहज अनुमान कएल जा सकैत अछि ।
एहेन विभेदपूर्ण भाषासम्बन्धी प्रावधानक स्थानपर संघीय सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे संघीय विधायिकाक निर्णयद्वारा नेपाली एवम् देशक अन्य एक वा दूटा संशाधनयुक्त भाषाकें प्रयोग करक प्रावधान नव संविधानमे संशोधनद्वारा करब आवश्यक अछि । संघीय सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे एकेटा भाषाक प्रयोगक व्यवस्था नहि कए “भाषा आयोगक सिफारिशपर निश्चित मापदण्ड पूरा करएबला अन्य कोनो भाषाकेँ केन्द्रीय सरकारक सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे मान्यता देबक हेतु केन्द्रीय विधायिकाद्धारा पारित भेलापर एहेन भाषा केन्द्रीय सरकारक कामकाजक भाषाक मान्यता पाओत” कहि कए संविधान सभा (प्रथम) द्धारा गठित सांस्कृतिक एवं सामाजिक एक्यबद्धताक आधार निर्धारण समितिक प्रतिवेदन मे सुझाओ प्रस्तावित छैक, जे प्रतिवेदन संविधान सभा (दोसर) क सम्पतिक रुपमे संविधान सभा (दोसर)क निर्णयद्धारा ग्रहण कएल गेल छैक । ताहि सुझाओकें नजरअन्दाज कए नव संविधानमे संघीय सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे नेपालीएटाक उल्लेख करब एक–भाषा नीतिकेँ बढाबा देब होएत, जे अनुचित अछि । संघीय सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे विकल्परहित एकेटा भाषाक रुपमे नेपालीक प्रयोग करएक व्यवस्थाक संगहि प्रादेशिक सरकारोक कामकाजक भाषाक रुपमे नेपालीक प्रयोगमे प्राथमिकता देल जाए तँ एहेनमे प्रदेशक भाषासब एवं ओकर सबहक भाषा–भाषी समुदायोमे निर्विवाद रुपसँ उत्पीडन बढ्तैक । तेँ, प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे प्रदेशेक भाषासबकेँ प्राथमिकता देलासँ भाषासम्बन्धी उत्पीडनमे रहल विभिन्न गैर–नेपाली भाषा–भाषी समुदायोमे आर्थिक–सामाजिक परिवत्र्तन आओत । एहि तरहें, प्रदेशक एक वा दूटा बहुसंख्यक बाजल जाएबला भाषा वा नेपालीकें प्रादेशिक विधायिकाक निर्णयद्वारा प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषा बनाएब उपयुक्त होएत । एतने नहि, संघीय एवं प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषासबकेँ नव संविधानक अलग अनुसूचीमें उल्लेख होएबाक चाही ।एहेन बहुभाषा नीतिसम्बन्धी संबैधानिक व्यवस्था भारतमे पाओल जाइत अछि, जे विश्वमे बहुभाषावादक प्रमुख पक्षधर रहल अछि । भारतीय संविधानक घारा ३४३–३४५ मे हिन्दी आ अंगे्रजी संघीय सरकारक कामकाजक भाषा होएत एवं प्रदेशक विधानसभा प्रदेशक एक वा एकसँ बेशी भाषा वा हिन्दीकें प्रादेशिक सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे प्रयोगक हेतु निर्णय करक बात उल्लेख कएने अछि । भारतीय संविधानक धारा ३४३ मे संविधान प्रारम्भ भेलाक पनरह वर्षकबाद संघीय सरकारक कामकाजक भाषाके रुपमे अंगे्रजीक प्रयोग नहि होएबाक बातक उल्लेख होइतहुँ गैर–हिन्दी भाषाभाषी क्षेत्रक जनभावना एवं भारतमे वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकासक हेतु अंग्रेजीक प्रयोगसम्बन्धी संबैधानिक व्यवस्थाकें निरन्तरता राखल गेल छैक । तहिना, भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे नेपाली, मैथिली, संस्कृत, उर्दू, आदि २२ टा भाषाकें – समावेश भेल छैक जाहिमे करिव ढेड दर्जन भाषासब विभिन्न प्रदेशक सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे व्यापक ढङ्गसँ प्रयोगमे अछि ।
भारतक बहुभाषा नीतिक नमूनाक विकल्पमे दक्षिण अफ्रिकाक संविधान (१९९६) क अध्याय १ भाग ६(१.३क) मे देल गेल बहुभाषा पद्धतिकअनुरुप अपन देशक नव संविधानमे संशोधन तथा परिष्करण कएल जा सकैत अछि । दक्षिण अफ्रिकाक संविधानमे अंगे्रजीक अतिरिक्त दशटा जनजातीय भाषासबकें सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे सूचीकृत कएने अछि, जाहिमेसँ राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक विधायिका कम–सँ–कम दूटा भाषाकेँ अपन – अपन सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे प्रयोग करक बात उल्लेख कएने अछि । दक्षिण अफ्रिकाक एहि बहुभाषा नीतिक नमूनाक अनुशरण कए देशक जनसंख्याक एक प्रतिशतद्वारा बाजल जाएबला भाषा (नेपाली, मैथिली, भोजपुरी, थारु, तामाङ्ग, नेवारी, बज्जिका, मगर, डोटेली, उर्दू, अवधी, लिम्बू, गुरुङ्ग, वैतेडीली) क संगहि तराई–मधेशक सम्पर्क भाषाक रुपमे रहल हिन्दी एवं साहित्यिक तथा धार्मिक भाषाक रुपमे रहल संस्कृतकें संविधानमे सूचीकृत कएल जाए एवं एहिमेसँ कोनो दूटा भाषाकें संघीय आ प्रादेशिक सरकारद्वारा अपन–अपन सरकारक कामकाजक भाषाक रुपमे ग्रहण करक व्यवस्था संविधानमे संशोधनद्वारा होए । एतने नहि, कोनो भाषाकें सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे मान्यता प्राप्त करक हेतु आधारसब निर्धारित कए नेपाल सरकारसमक्ष भाषा आयोगद्वारा सिफारिस करक संबैधानिक व्यवस्था (धारा २८७.६क) झञ्झटपूर्ण एवम् विभेदपूर्ण होएबाक कारण एकर खारिज करब आवश्यक अछि । सरकारी कामकाजक भाषासम्बन्धी निर्णय राजनीतिक स्वभावक होएबाक कारण एकर सम्पूर्ण अधिकार सम्बन्धित विधायिकामे निहित होएबाक चाही । विधायिकाद्वारा कोनो भाषाक पक्षमे एहेन निर्णय भेलाकबाद ओहि भाषाक आवश्यक संरचनागत विकास एवं समग्र रुपमे तकर संरक्षण एवं सम्वद्धर्नक दायित्व भाषा आयोगक होएबाक चाही । एहेन व्यवस्था द.अफ्रिकाक उत्पीडनमे रहल जनजातीय भाषासबहक सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे स्तरगत विकासक प्रयोजनहेतु ओकर सबहक संरचनागत विकासक उद्देश्यसँ भाषासम्बन्धी प्रतिष्ठानक सम्बैधानिक व्यवस्था कएल गेल छैक । तें, भारतीय वा द.अफ्रिकी वा किछु एहने तरहक बहुभाषा नीतिक नमूनाकें अनुसरण कएलासँ सही अर्थमे देशक भाषासबहक संरक्षणसङ्गहि राष्ट्रीयतो सुदृढ होएत ।
एतए, विभेदकारी एवम् निषेधकारी धारा २८९ क उल्लेख करब आवश्यक होएत किएक त ई धाराक कारण अंगीकृत नागरिकता प्राप्त व्यक्ति करीब १ दर्जन उच्च संवैधानिक पदेटा प्राप्त करएसँ बञ्चित नहि होएताह वल्कि दर्जनौं अन्य सबैधानिक पद प्राप्त करएहेतु १० बर्षकलेल प्रतिवन्धोकेँ सहन करए पडतैन्हि । तराई–मधेश आ’ एहिसँ जोडल भारतक ५ पडोसी राज्यसबहकबीच प्राचिन कालेसँ धनिष्ठतम् सम्बन्ध रहल छैक, जकर खुला सीमा आ समान भाषा, संस्कृति एवं धर्म छैक । तथा जकर सीमाक दूनू कातक जनसमुदायकबीच खून आ विआहक परस्पर गहरा सम्बन्ध रहल छैक । जतएधरि सीमाक दूनू भूभागक बीच ऐतिहासिक सम्बन्धक बात अछि, पृथ्वी नारायण शाहक गोरखा राज्य विस्तारसँ पहिने तराई–मधेशक सेन वंशी राजा दिल्ली दरवारकेँ कर बुझाबैत रहथि । सेनवंशी शासनसँ किछु दशकपूर्व तराई–मधेशक एवं ई पाँचो राज्यकबीच हजारौं वर्षक साझी, अभिन्न एवं अविछिन्न इतिहास रहल छैक । एहेन विशिष्ट परिस्थतिक कारण नेपालक अधिकतम् अंगीकृत नागरिक तराई–मधेश क्षेत्रसँ आबैत छथि, जे एहि धाराकें शिकार होएताह । तें धारा २८९ के खारिज करब वाञ्छनीय अछि ।
एहि तरहें, नव संविधानमे विभेदकारी धारासबहक श्रृंखला छैक जाहि कारणें द्वन्द्व काएम अछि । तीन दलक शीर्ष नेतालोकनि देशक राजनैतिक दुर्दशाक मुख्य कर्ता छथि । जाहि समयमे तराई–मधेशक आन्दोलन अपन उँचाइपर छल, ई नेतालोकनि संविधानसभामे विना ब्यापक विचार–विमर्श कएने आम जनताकें धोखामे राखि जनआन्दोलनक मर्मविपरित जल्दवाजीमे स्वजाति वर्गक स्वार्थमे संविधान लेखन कार्य सम्पन्न कएलैन्हि । तें, देशकें राजनैतिक संकटसँ निकास दएबाक प्रमुख दायित्व हिनकें सबपर होएबाक कारणें यथास्थिति चिन्तनसँ मुक्त भए आन्दोलनरत मधेशी, थारु, अन्य जनजाति समुदायसङ्ग घनिभूत बार्ता कए समग्र संबैधानिक मुद्दासबकेँ विवेकपूर्ण ढंगसँ निराकरण करैत संशोधनद्वारा नव संविधानकें परिस्कृत करैथि एवं देशक राजनैतिक–आर्थिक–सामाजिक विकासक रास्ता प्रसस्त करैथि ।
(लेखक झा त्रिभुवन विश्व विद्यालयक अवकाशप्राप्त प्राध्यापक एवम् संघीयता विषयके जानकार छथि ।)



