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चीर हरण

चीर हरण

देवेन्द्र  मिश्र
एक बेर फेरो
चीर हरण भऽ रहल अछि
पृथ्वीपुत्री द्रोपदीक
हस्तिनापुरक दरबारमे
उच्चासन पर बैसल
दुर्योधनक पुष्ठपोषक आ
मर्यादा शोषकसभ
भीष्म, द्रोण, कृप, विदुर

सओ– सओ मूस खा कऽ
हज करए जा रहल बिलाड़सभ
देखि रहल अछि अङ्ग–प्रत्यङ्ग उघार होइत
अपन रक्षाक लेल
जकरा पर विश्वास कएलक ओ, आ
जेसभ थथमारि कऽ आएल छल राजसभामे ओकरा
सएह धरतीपुत्र तथाकथित स्वघोषित वीरसभ
युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन आ नकुलो–सहदेवो
टुकुर–टुकुर ताकि रहल
अपन ठोर अपनहि चिबा रहल

अपन नपुंसकता पर अपनहि पछता रहल ।
रौ पाण्डवसभ,
ई महाभारत किछु भिन्न अछि
ओहिमे तऽ चीर हरणक बाद बनल छल कुरुक्षेत्र
एहिमे पहिनहि भेल एना
आब,
तोरासभक बाट नहि ताकब हम
किएक तऽ हमरा बुझले अछि जे
एहि बेर हमरा सङ्ग फेरो विश्वासघात भेल
आ इहो बुझले अछि जे
हमर लाज बचाबए
फेरो दामोदर एबे करत
सीताक मर्यादा नहि बचेलनि तैं कि
हमर ओ लाज बचेबे करत
तैं आब   गरजि रहल अछि द्रोपदी
हम आब अपनहि लड़ब अपन अस्मिताक रक्षार्थ
घोषणा कऽ रहल अछि ओ, जे
बदले पड़त जँ एहि बेर
तऽ पाण्डवो बदलि लेत ओ,
मुदा आब विश्वास नहि करत आब ओकरा पर ।

(लेखक मैथिली साहित्य परिषद् राजविराजक पूर्व अध्यक्ष छथि ।)

About The Author

लेखक यादव पत्रकारिताका साथै भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, पर्यटन, ऐतिहासिक एवम् पुरातात्विक क्षेत्रमा कलम चलाउँछन् (सं) ।

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